ghazalKuch Alfaaz

डोली उठा के ले गए महलों के बादशाह सड़कों से देखते रहे सड़कों के बादशाह उम्मीद की किरण में हर इक खेत जल गए सलफ़ास खा के मर गए खेतों के बादशाह मैं दूसरी ग़ज़ल की तरफ़ चल दिया तो दोस्त पिछली बुलाती रह गई ग़ज़लों के बादशाह आँखों की तख़्त-पोशी तो बीनाई ले गई आँसू बनेंगे देखियो पलकों के बादशाह

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अभी इक शोर सा उठा है कहीं कोई ख़ामोश हो गया है कहीं है कुछ ऐसा कि जैसे ये सब कुछ इस से पहले भी हो चुका है कहीं तुझ को क्या हो गया कि चीज़ों को कहीं रखता है ढूँढ़ता है कहीं जो यहाँ से कहीं न जाता था वो यहाँ से चला गया है कहीं आज शमशान की सी बू है यहाँ क्या कोई जिस्म जल रहा है कहीं हम किसी के नहीं जहाँ के सिवा ऐसी वो ख़ास बात क्या है कहीं तू मुझे ढूँड मैं तुझे ढूँडूँ कोई हम में से रह गया है कहीं कितनी वहशत है दरमियान-ए-हुजूम जिस को देखो गया हुआ है कहीं मैं तो अब शहर में कहीं भी नहीं क्या मिरा नाम भी लिखा है कहीं इसी कमरे से कोई हो के विदाअ'' इसी कमरे में छुप गया है कहीं मिल के हर शख़्स से हुआ महसूस मुझ से ये शख़्स मिल चुका है कहीं

Jaun Elia

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जो इस्म-ओ-जिस्म को बाहम निभाने वाला नहीं मैं ऐसे इश्क़ पर ईमान लाने वाला नहीं मैं पाँव धोके पि यूँ, यार बनके जो आए मुनाफ़िक़ों को तो मैं मुँह लगाने वाला नहीं बस इतना जान ले ऐ पुर-कशिश के दिल तुझ सेे बहल तो सकता है पर तुझ पे आने वाला नहीं तुझे किसी ने ग़लत कह दिया मेरे बारे नहीं मियाँ मैं दिलों को दुखाने वाला नहीं सुन ऐ काबिला-ए-कुफी-दिलाँ मुकर्रर सुन अली कभी भी हजीमत उठाने वाला नहीं

Ali Zaryoun

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बात ऐसी है ऐसा था पहले दर्द होने पे रोता था पहले जैसे चाहे वो खेला करता था मैं किसी का खिलौना था पहले तुझ पे कितना भरोसा करता था ख़ुद पे कितना भरोसा था पहले आख़िरी रास्ते पे चलने को पैर उस ने उठाया था पहले अब तो तस्वीर तक नहीं बनती मैं तो पैकर बनाता था पहले रौशनी आई जब जला कोई सबकी आँखों पे पर्दा था पहले गिनती पीछे से की गई वरना मेरा नंबर तो पहला था पहले

Himanshi babra KATIB

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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वैसे मैं ने दुनिया में क्या देखा है तुम कहते हो तो फिर अच्छा देखा है मैं उस को अपनी वहशत तोहफ़े में दूँ हाथ उठाए जिस ने सहरा देखा है बिन देखे उस की तस्वीर बना लूँगा आज तो मैं ने उस को इतना देखा है एक नज़र में मंज़र कब खुलते हैं दोस्त तू ने देखा भी है तो क्या देखा है इश्क़ में बंदा मर भी सकता है मैं ने दिल की दस्तावेज़ में लिखा देखा है मैं तो आँखें देख के ही बतला दूँगा तुम में से किस किस ने दरिया देखा है आगे सीधे हाथ पे एक तराई है मैं ने पहले भी ये रस्ता देखा है तुम को तो इस बाग़ का नाम पता होगा तुम ने तो इस शहर का नक़्शा देखा है

Tehzeeb Hafi

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उदास लड़कियों से राब्ता निभाता हूँ मैं एक फूल हूँ जो तितलियाँ बचाता हूँ जी मैं ही इश्क़ में हारे हुओं का मुर्शिद हूँ जी मैं ही हर सदी में क़ैस बन के आता हूँ सताई होती हैं जो आप के समुंदर की मैं ऐसी मछलियों के साथ गोते खाता हूँ किसी के वास्ते काँटे नहीं बिछाता मैं मगर यूँँ भी नहीं के काँटों को हटाता हूँ मैं मौसमी हँसी का मारा हूँ कि कोई दिन मैं साल भर में कोई दिन ही मुस्कुराता हूँ बदन भी आते हैं और हिचकियाँ भी आती हैं मैं जिन को भूल गया उन को याद आता हूँ निभाने जैसा तो कुछ भी नहीं है उस में मगर वो मर न जाए कहीं इस लिए निभाता हूँ

Rishabh Sharma

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जो कि होते हुए आज़ार बहुत होता है बा'द होने के मज़ेदार बहुत होता है दिन बदलने के लिए ख़ुद-कुशी करने के लिए एक ही शख़्स का इनकार बहुत होता है भागने वाले को दुनिया भी बहुत छोटी है घूमने वाले को बाज़ार बहुत होता है जिस ने भेजा है तुम्हें जा के उसे कहना तुम लाख प्यादों में भी सालार बहुत होता है जंग हर चीज़ को हथियार बना देती है बच्चे के हाथ में परकार बहुत होता है छत से छत वालों में दीवार खड़ी करने को उन के बच्चों में हुआ प्यार बहुत होता है

Rishabh Sharma

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सारा सामान लिए घर से निकल आई है फ़ोन पर फ़ोन लगाती हुई तन्हाई है याद आने लगे हैं लोग मुझे गुज़रे हुए दोस्त क्या तू ने मेरी झूठी क़सम खाई है अपनी दुनिया में मगन रहना इसे कहते हैं इक पलस्तर झड़ी दीवार पे जो काई है बात जो दिल पे लगी है वो कोई बात नहीं सर के ऊपर से गई बात में गहराई है उस के पहलू में भला सोचता हूँ क्या क्या मैं ख़्वाब में आ गया हूँ नींद नहीं आई है

Rishabh Sharma

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क्या दोस्त मुहब्बत का नियम कुछ नहीं होता खा लेते हैं सब झूठी क़सम कुछ नहीं होता वो पर्दा नशीं पूछती रहती है मुझे रोज़ क्या वाकई में अगला जनम कुछ नहीं होता परवत के मुहाने पे खड़ा सोच रहा हूँ किस ने कहा था एक क़दम कुछ नहीं होता और वाक़्या मशहूर था जिस पेड़ को ले कर उस पेड़ पे लिक्खा था भरम कुछ नहीं होता वो रौशनी के दिन थे ऋषभ शर्मा तेरे साथ जब तू हमें समझाता था ग़म कुछ नहीं होता

Rishabh Sharma

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पराए शहर में इक दोस्त की जगह थी वो कि सुख में जिस्म थी और दुख में मसखरा थी वो वो लड़-झगड़ के मेरे पास लौट आती थी पहाड़ों पर से कोई दी हुई सदा थी वो शरीफ़ लड़कियों के दिल जो मैं ने तोड़े थे उन्हीं की भेजी हुई एक बद-दुआ थी वो

Rishabh Sharma

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