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लाई फिर इक लग़्ज़िश-ए-मस्ताना तेरे शहर में फिर बनेंगी मस्जिदें मय-ख़ाना तेरे शहर में आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँ आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में जुर्म है तेरी गली से सर झुका कर लौटना कुफ़्र है पथराव से घबराना तेरे शहर में शाह-ना में लिक्खे हैं खंडरात की हर ईंट पर हर जगह है दफ़्न इक अफ़्साना तेरे शहर में कुछ कनीज़ें जो हरीम-ए-नाज़ में हैं बारयाब माँगती हैं जान ओ दिल नज़राना तेरे शहर में नंगी सड़कों पर भटक कर देख जब मरती है रात रेंगता है हर तरफ़ वीराना तेरे शहर में

Kaifi Azmi0 Likes

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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ख़ार-ओ-ख़स तो उठें रास्ता तो चले मैं अगर थक गया क़ाफ़िला तो चले चाँद सूरज बुज़ुर्गों के नक़्श-ए-क़दम ख़ैर बुझने दो उन को हवा तो चले हाकिम-ए-शहर ये भी कोई शहर है मस्जिदें बंद हैं मय-कदा तो चले उस को मज़हब कहो या सियासत कहो ख़ुद-कुशी का हुनर तुम सिखा तो चले इतनी लाशें मैं कैसे उठा पाऊँगा आप ईंटों की हुरमत बचा तो चले बेलचे लाओ खोलो ज़मीं की तहें मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले

Kaifi Azmi

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जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा बिछड़ के उन से सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा लबों से उड़ गया जुगनू की तरह नाम उस का सहारा अब मिरे घर में न रौशनी का रहा गुज़रने को तो हज़ारों ही क़ाफ़िले गुज़रे ज़मीं पे नक़्श-ए-क़दम बस किसी किसी का रहा

Kaifi Azmi

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की है कोई हसीन ख़ता हर ख़ता के साथ थोड़ा सा प्यार भी मुझे दे दो सज़ा के साथ गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ मंज़िल से वो भी दूर था और हम भी दूर थे हम ने भी धूल उड़ाई बहुत रहनुमा के साथ रक़्स-ए-सबा के जश्न में हम तुम भी नाचते ऐ काश तुम भी आ गए होते सबा के साथ इक्कीसवीं सदी की तरफ़ हम चले तो हैं फ़ित्ने भी जाग उट्ठे हैं आवाज़-ए-पा के साथ ऐसा लगा ग़रीबी की रेखा से हूँ बुलंद पूछा किसी ने हाल कुछ ऐसी अदा के साथ

Kaifi Azmi

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पत्थर के ख़ुदा वहाँ भी पाए हम चाँद से आज लौट आए दीवारें तो हर तरफ़ खड़ी हैं क्या हो गए मेहरबान साए जंगल की हवाएँ आ रही हैं काग़ज़ का ये शहर उड़ न जाए लैला ने नया जनम लिया है है क़ैस कोई जो दिल लगाए है आज ज़मीं का ग़ुस्ल-ए-सेह्हत जिस दिल में हो जितना ख़ून लाए सहरा सहरा लहू के खे़ में फिर प्यासे लब-ए-फ़ुरात आए

Kaifi Azmi

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शोर यूँँही न परिंदों ने मचाया होगा कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा बानी-ए-जश्न-ए-बहाराँ ने ये सोचा भी नहीं किस ने काँटों को लहू अपना पिलाया होगा बिजली के तार पे बैठा हुआ हँसता पंछी सोचता है कि वो जंगल तो पराया होगा अपने जंगल से जो घबरा के उड़े थे प्यासे हर सराब उन को समुंदर नज़र आया होगा

Kaifi Azmi

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