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lagta nahin hai dil mira ujde dayar men kis ki bani hai alam-e-na-paedar men my heart wanders ill at ease / in this ravaged reign who has found fruition / in transient terrain in hasraton se kah do kahin aur ja basen itni jagah kahan hai dil-e-daghh-dar men tell these woeful wishes to / go elsewhere and remain this heart has little room as it / is scarred and full of pain kanton ko mat nikal chaman se o baghhban ye bhi gulon ke saath pale hain bahar men from throwing throns out of the vale, o gardener, abstain they too grew, along with flowers, during spring's domain bulbul ko baghhban se na sayyad se gila qismat men qaid likkhi thi fasl-e-bahar men neither to the groundsman nor / to hunter does complain for songbird to be caged, in spring, did destiny ordain kitna hai bad-nasib 'zafar' dafn ke liye do gaz zamin bhi na mili ku-e-yar men say how ill-starred is 'zafar', that he could not obtain e'en two yards, to be interred, in his beloved's lane lagta nahin hai dil mera ujde dayar mein kis ki bani hai aalam-e-na-paedar mein my heart wanders ill at ease / in this ravaged reign who has found fruition / in transient terrain in hasraton se kah do kahin aur ja basen itni jagah kahan hai dil-e-dagh-dar mein tell these woeful wishes to / go elsewhere and remain this heart has little room as it / is scarred and full of pain kanton ko mat nikal chaman se o baghban ye bhi gulon ke sath pale hain bahaar mein from throwing throns out of the vale, o gardener, abstain they too grew, along with flowers, during spring's domain bulbul ko baghban se na sayyaad se gila qismat mein qaid likkhi thi fasl-e-bahaar mein neither to the groundsman nor / to hunter does complain for songbird to be caged, in spring, did destiny ordain kitna hai bad-nasib 'zafar' dafn ke liye do gaz zamin bhi na mili ku-e-yar mein say how ill-starred is 'zafar', that he could not obtain e'en two yards, to be interred, in his beloved's lane

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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हम ने तिरी ख़ातिर से दिल-ए-ज़ार भी छोड़ा तू भी न हुआ यार और इक यार भी छोड़ा क्या होगा रफ़ूगर से रफ़ू मेरा गरेबान ऐ दस्त-ए-जुनूँ तू ने नहीं तार भी छोड़ा दीं दे के गया कुफ़्र के भी काम से आशिक़ तस्बीह के साथ उस ने तो ज़ुन्नार भी छोड़ा गोशे में तिरी चश्म-ए-सियह-मस्त के दिल ने की जब से जगह ख़ाना-ए-ख़ु़म्मार भी छोड़ा इस से है ग़रीबों को तसल्ली कि अजल ने मुफ़्लिस को जो मारा तो न ज़रदार भी छोड़ा टेढ़े न हो हम से रखो इख़्लास तो सीधा तुम प्यार से रुकते हो तो लो प्यार भी छोड़ा क्या छोड़ें असीरान-ए-मोहब्बत को वो जिस ने सदक़े में न इक मुर्ग़-ए-गिरफ़्तार भी छोड़ा पहुँची मिरी रुस्वाई की क्यूँँकर ख़बर उस को उस शोख़ ने तो देखना अख़बार भी छोड़ा करता था जो याँ आने का झूटा कभी इक़रार मुद्दत से 'ज़फ़र' उस ने वो इक़रार भी छोड़ा

Bahadur Shah Zafar

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टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के चार पाँच सुरख़ाब बैठे पानी में हैं मिल के चार पाँच मुँह खोले हैं ये ज़ख़्म जो बिस्मिल के चार पाँच फिर लेंगे बोसे ख़ंजर-ए-क़ातिल के चार पाँच कहने हैं मतलब उन से हमें दिल के चार पाँच क्या कहिए एक मुँह हैं वहाँ मिल के चार पाँच दरिया में गिर पड़ा जो मिरा अश्क एक गर्म बुत-ख़ाने लब पे हो गए साहिल के चार पाँच दो-चार लाशे अब भी पड़े तेरे दर पे हैं और आगे दब चुके हैं तले गिल के चार पाँच राहें हैं दो मजाज़ ओ हक़ीक़त है जिन का नाम रस्ते नहीं हैं इश्क़ की मंज़िल के चार पाँच रंज ओ ताब मुसीबत ओ ग़म यास ओ दर्द ओ दाग़ आह ओ फ़ुग़ाँ रफ़ीक़ हैं ये दिल के चार पाँच दो तीन झटके दूँ जूँ ही वहशत के ज़ोर में ज़िंदाँ में टुकड़े होवें सलासिल के चार पाँच फ़रहाद ओ क़ैस ओ वामिक़ ओ अज़रा थे चार दोस्त अब हम भी आ मिले तो हुए मिल के चार पाँच नाज़ ओ अदा ओ ग़म्ज़ा निगह पंजा-ए-मिज़ा मारें हैं एक दिल को ये पिल पिल के चार पाँच ईमा है ये कि देवेंगे नौ दिन के बा'द दिल लिख भेजे ख़त में शे'र जो बे-दिल के चार पाँच हीरे के नौ-रतन नहीं तेरे हुए हैं जमा ये चाँदनी के फूल मगर खिल के चार पाँच मीना-ए-नुह-फ़लक है कहाँ बादा-ए-नशात शीशे हैं ये तो ज़हर-ए-हलाहल के चार पाँच नाख़ुन करें हैं ज़ख़्मों को दो दो मिला के एक थे आठ दस सो हो गए अब छिल के चार पाँच गर अंजुम-ए-फ़लक से भी तादाद कीजिए निकलें ज़ियादा दाग़ मिरे दिल के चार पाँच मारें जो सर पे सिल को उठा कर क़लक़ से हम दस पाँच टुकड़े सर के हों और सिल के चार पाँच मान ऐ 'ज़फ़र' तू पंज-तन ओ चार-यार को हैं सदर-ए-दीन की यही महफ़िल के चार पाँच

Bahadur Shah Zafar

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क्यूँँकर न ख़ाकसार रहें अहल-ए-कीं से दूर देखो ज़मीं फ़लक से फ़लक है ज़मीं से दूर परवाना वस्ल-ए-शम्अ पे देता है अपनी जाँ क्यूँँकर रहे दिल उस के रुख़-ए-आतिशीं से दूर मज़मून-ए-वस्ल-व-हिज्र जो ना में में है रक़म है हर्फ़ भी कहीं से मिले और कहीं से दूर गो तीर-ए-बे-गुमाँ है मिरे पास पर अभी जाए निकल के सीना-ए-चर्ख़-ए-बरीं से दूर वो कौन है कि जाते नहीं आप जिस के पास लेकिन हमेशा भागते हो तुम हमीं से दूर हैरान हूँ कि उस के मुक़ाबिल हो आईना जो पुर-ग़ुरूर खिंचता है माह-ए-मुबीं से दूर याँ तक अदू का पास है उन को कि बज़्म में वो बैठते भी हैं तो मिरे हम-नशीं से दूर मंज़ूर हो जो दीद तुझे दिल की आँख से पहुँचे तिरी नज़र निगह-ए-दूर-बीं से दूर दुनिया-ए-दूँ की दे न मोहब्बत ख़ुदा 'ज़फ़र' इंसाँ को फेंक दे है ये ईमान ओ दीं से दूर

Bahadur Shah Zafar

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जिगर के टुकड़े हुए जल के दिल कबाब हुआ ये इश्क़ जान को मेरे कोई अज़ाब हुआ किया जो क़त्ल मुझे तुम ने ख़ूब काम किया कि मैं अज़ाब से छूटा तुम्हें सवाब हुआ कभी तो शेफ़्ता उस ने कहा कभी शैदा ग़रज़ कि रोज़ नया इक मुझे ख़िताब हुआ पि यूँँ न रश्क से ख़ूँ क्यूँँकि दम-ब-दम अपना कि साथ ग़ैर के वो आज हम-शराब हुआ तुम्हारे लब के लब-ए-जाम ने लिए बोसे लब अपने काटा किया मैं न कामयाब हुआ गली गली तिरी ख़ातिर फिरा ब-चश्म-ए-पुर-आब लगा के तुझ से दिल अपना बहुत ख़राब हुआ तिरी गली में बहाए फिरे है सैल-ए-सरिश्क हमारा कासा-ए-सर क्या हुआ हबाब हुआ जवाब-ए-ख़त के न लिखने से ये हुआ मालूम कि आज से हमें ऐ नामा-बर जवाब हुआ मँगाई थी तिरी तस्वीर दिल की तस्कीं को मुझे तो देखते ही और इज़्तिराब हुआ सितम तुम्हारे बहुत और दिन हिसाब का एक मुझे है सोच ये ही किस तरह हिसाब हुआ 'ज़फ़र' बदल के रदीफ़ और तू ग़ज़ल वो सुना कि जिस का तुझ से हर इक शे'र इंतिख़ाब हुआ

Bahadur Shah Zafar

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भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ सुने है कौन मुसीबत कहूँ तो किस से कहूँ जो तू हो साफ़ तो कुछ मैं भी साफ़ तुझ से कहूँ तेरे है दिल में कुदूरत कहूँ तो किस से कहूँ न कोहकन है न मजनूँ कि थे मेरे हमदर्द मैं अपना दर्द-ए-मोहब्बत कहूँ तो किस से कहूँ दिल उस को आप दिया आप ही पशेमाँ हूँ कि सच है अपनी नदामत कहूँ तो किस से कहूँ कहूँ मैं जिस से उसे होवे सुनते ही वहशत फिर अपना क़िस्सा-ए-वहशत कहूँ तो किस से कहूँ रहा है तू ही तो ग़म-ख़्वार ऐ दिल-ए-ग़म-गीं तेरे सिवा ग़म-ए-फ़ुर्क़त कहूँ तो किस से कहूँ जो दोस्त हो तो कहूँ तुझ से दोस्ती की बात तुझे तो मुझ से अदावत कहूँ तो किस से कहूँ न मुझ को कहने की ताक़त कहूँ तो क्या अहवाल न उस को सुनने की फ़ुर्सत कहूँ तो किस से कहूँ किसी को देखता इतना नहीं हक़ीक़त में 'ज़फ़र' मैं अपनी हक़ीक़त कहूँ तो किस से कहूँ

Bahadur Shah Zafar

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