ghazalKuch Alfaaz

जिगर के टुकड़े हुए जल के दिल कबाब हुआ ये इश्क़ जान को मेरे कोई अज़ाब हुआ किया जो क़त्ल मुझे तुम ने ख़ूब काम किया कि मैं अज़ाब से छूटा तुम्हें सवाब हुआ कभी तो शेफ़्ता उस ने कहा कभी शैदा ग़रज़ कि रोज़ नया इक मुझे ख़िताब हुआ पि यूँँ न रश्क से ख़ूँ क्यूँँकि दम-ब-दम अपना कि साथ ग़ैर के वो आज हम-शराब हुआ तुम्हारे लब के लब-ए-जाम ने लिए बोसे लब अपने काटा किया मैं न कामयाब हुआ गली गली तिरी ख़ातिर फिरा ब-चश्म-ए-पुर-आब लगा के तुझ से दिल अपना बहुत ख़राब हुआ तिरी गली में बहाए फिरे है सैल-ए-सरिश्क हमारा कासा-ए-सर क्या हुआ हबाब हुआ जवाब-ए-ख़त के न लिखने से ये हुआ मालूम कि आज से हमें ऐ नामा-बर जवाब हुआ मँगाई थी तिरी तस्वीर दिल की तस्कीं को मुझे तो देखते ही और इज़्तिराब हुआ सितम तुम्हारे बहुत और दिन हिसाब का एक मुझे है सोच ये ही किस तरह हिसाब हुआ 'ज़फ़र' बदल के रदीफ़ और तू ग़ज़ल वो सुना कि जिस का तुझ से हर इक शे'र इंतिख़ाब हुआ

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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हम ने तिरी ख़ातिर से दिल-ए-ज़ार भी छोड़ा तू भी न हुआ यार और इक यार भी छोड़ा क्या होगा रफ़ूगर से रफ़ू मेरा गरेबान ऐ दस्त-ए-जुनूँ तू ने नहीं तार भी छोड़ा दीं दे के गया कुफ़्र के भी काम से आशिक़ तस्बीह के साथ उस ने तो ज़ुन्नार भी छोड़ा गोशे में तिरी चश्म-ए-सियह-मस्त के दिल ने की जब से जगह ख़ाना-ए-ख़ु़म्मार भी छोड़ा इस से है ग़रीबों को तसल्ली कि अजल ने मुफ़्लिस को जो मारा तो न ज़रदार भी छोड़ा टेढ़े न हो हम से रखो इख़्लास तो सीधा तुम प्यार से रुकते हो तो लो प्यार भी छोड़ा क्या छोड़ें असीरान-ए-मोहब्बत को वो जिस ने सदक़े में न इक मुर्ग़-ए-गिरफ़्तार भी छोड़ा पहुँची मिरी रुस्वाई की क्यूँँकर ख़बर उस को उस शोख़ ने तो देखना अख़बार भी छोड़ा करता था जो याँ आने का झूटा कभी इक़रार मुद्दत से 'ज़फ़र' उस ने वो इक़रार भी छोड़ा

Bahadur Shah Zafar

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शमशीर-ए-बरहना माँग ग़ज़ब बालों की महक फिर वैसी ही जूड़े की गुंधावट क़हर-ए-ख़ुदा बालों की महक फिर वैसी ही आँखें हैं कटोरा सी वो सितम गर्दन है सुराही-दार ग़ज़ब और उसी में शराब-ए-सुर्ख़ी-ए-पाँ रखती है झलक फिर वैसी ही हर बात में उस की गर्मी है हर नाज़ में उस के शोख़ी है क़ामत है क़यामत चाल परी चलने में फड़क फिर वैसी ही गर रंग भबूका आतिश है और बीनी शोला-ए-सरकश है तो बिजली सी कौंदे है परी आरिज़ की चमक फिर वैसी ही नौ-ख़ेज़ कुचें दो ग़ुंचा हैं है नर्म शिकम इक ख़िर्मन-ए-गुल बारीक कमर जो शाख़-ए-गुल रखती है लचक फिर वैसी ही है नाफ़ कोई गिर्दाब-ए-बला और गोल सुरीं रानें हैं सफ़ा है साक़ बिलोरीं शम-ए-ज़िया पाँव की कफ़क फिर वैसी ही महरम है हबाब-ए-आब-ए-रवाँ सूरज की किरन है उस पे लिपट जाली की कुर्ती है वो बला गोटे की धनक फिर वैसी ही वो गाए तो आफ़त लाए है हर ताल में लेवे जान निकाल नाच उस का उठाए सौ फ़ित्ने घुँगरू की झनक फिर वैसी ही हर बात पे हम से वो जो 'ज़फ़र' करता है लगावट मुद्दत से और उस की चाहत रखते हैं हम आज तलक फिर वैसी ही

Bahadur Shah Zafar

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इतना न अपने जा में से बाहर निकल के चल दुनिया है चल-चलाव का रस्ता संभल के चल औरों के बल पे बल न कर इतना न चल निकल बल है तो बल के बल पे तू कुछ अपने बल के चल इंसां को कल का पुतला बनाया है उस ने आप और आप ही वो कहता है पुतले को कल के चल फिर आँखें भी तो दीं हैं कि रख देख कर क़दम कहता है कौन तुझ को न चल चल संभल के चल क्या चल सकेगा हम से कि पहचानते हैं हम तू लाख अपनी चाल को ज़ालिम बदल के चल है शमा' सर के बल जो मोहब्बत में गर्म हो परवाना अपने दिल से ये कहता है जल के चल बुलबुल के होश निकहत-ए-गुल की तरह उड़ा गुलशन में मेरे साथ ज़रा इत्र मल के चल गर क़स्द सू-ए-दिल है तिरा ऐ निगाह-ए-यार दो-चार तीर पैक से आगे अजल के चल जो इम्तिहान-ए-तबाह करे अपना ऐ 'ज़फ़र' तो कह दो उस को तौर पे तू इस ग़ज़ल के चल

Bahadur Shah Zafar

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भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ सुने है कौन मुसीबत कहूँ तो किस से कहूँ जो तू हो साफ़ तो कुछ मैं भी साफ़ तुझ से कहूँ तेरे है दिल में कुदूरत कहूँ तो किस से कहूँ न कोहकन है न मजनूँ कि थे मेरे हमदर्द मैं अपना दर्द-ए-मोहब्बत कहूँ तो किस से कहूँ दिल उस को आप दिया आप ही पशेमाँ हूँ कि सच है अपनी नदामत कहूँ तो किस से कहूँ कहूँ मैं जिस से उसे होवे सुनते ही वहशत फिर अपना क़िस्सा-ए-वहशत कहूँ तो किस से कहूँ रहा है तू ही तो ग़म-ख़्वार ऐ दिल-ए-ग़म-गीं तेरे सिवा ग़म-ए-फ़ुर्क़त कहूँ तो किस से कहूँ जो दोस्त हो तो कहूँ तुझ से दोस्ती की बात तुझे तो मुझ से अदावत कहूँ तो किस से कहूँ न मुझ को कहने की ताक़त कहूँ तो क्या अहवाल न उस को सुनने की फ़ुर्सत कहूँ तो किस से कहूँ किसी को देखता इतना नहीं हक़ीक़त में 'ज़फ़र' मैं अपनी हक़ीक़त कहूँ तो किस से कहूँ

Bahadur Shah Zafar

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टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के चार पाँच सुरख़ाब बैठे पानी में हैं मिल के चार पाँच मुँह खोले हैं ये ज़ख़्म जो बिस्मिल के चार पाँच फिर लेंगे बोसे ख़ंजर-ए-क़ातिल के चार पाँच कहने हैं मतलब उन से हमें दिल के चार पाँच क्या कहिए एक मुँह हैं वहाँ मिल के चार पाँच दरिया में गिर पड़ा जो मिरा अश्क एक गर्म बुत-ख़ाने लब पे हो गए साहिल के चार पाँच दो-चार लाशे अब भी पड़े तेरे दर पे हैं और आगे दब चुके हैं तले गिल के चार पाँच राहें हैं दो मजाज़ ओ हक़ीक़त है जिन का नाम रस्ते नहीं हैं इश्क़ की मंज़िल के चार पाँच रंज ओ ताब मुसीबत ओ ग़म यास ओ दर्द ओ दाग़ आह ओ फ़ुग़ाँ रफ़ीक़ हैं ये दिल के चार पाँच दो तीन झटके दूँ जूँ ही वहशत के ज़ोर में ज़िंदाँ में टुकड़े होवें सलासिल के चार पाँच फ़रहाद ओ क़ैस ओ वामिक़ ओ अज़रा थे चार दोस्त अब हम भी आ मिले तो हुए मिल के चार पाँच नाज़ ओ अदा ओ ग़म्ज़ा निगह पंजा-ए-मिज़ा मारें हैं एक दिल को ये पिल पिल के चार पाँच ईमा है ये कि देवेंगे नौ दिन के बा'द दिल लिख भेजे ख़त में शे'र जो बे-दिल के चार पाँच हीरे के नौ-रतन नहीं तेरे हुए हैं जमा ये चाँदनी के फूल मगर खिल के चार पाँच मीना-ए-नुह-फ़लक है कहाँ बादा-ए-नशात शीशे हैं ये तो ज़हर-ए-हलाहल के चार पाँच नाख़ुन करें हैं ज़ख़्मों को दो दो मिला के एक थे आठ दस सो हो गए अब छिल के चार पाँच गर अंजुम-ए-फ़लक से भी तादाद कीजिए निकलें ज़ियादा दाग़ मिरे दिल के चार पाँच मारें जो सर पे सिल को उठा कर क़लक़ से हम दस पाँच टुकड़े सर के हों और सिल के चार पाँच मान ऐ 'ज़फ़र' तू पंज-तन ओ चार-यार को हैं सदर-ए-दीन की यही महफ़िल के चार पाँच

Bahadur Shah Zafar

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