ghazalKuch Alfaaz

ले के माज़ी को जो हाल आया तो दिल काँप गया जब कभी उन का ख़याल आया तो दिल काँप गया ऐसा तोड़ा था मुहब्बत में किसी ने दिल को जब किसी शीशे में बाल आया तो दिल काँप गया सर बुलंदी पे तो मग़रूर थे हम भी लेकिन चढ़ते सूरज पे ज़वाल आया तो दिल काँप गया बद-नज़र उठने ही वाली थी किसी की जानिब अपने बेटी का ख़याल आया तो दिल काँप गया

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढ़ता था जो इक नई दुनिया लौट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का

Javed Akhtar

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ख़ुद को कितना छोटा करना पड़ता है बेटे से समझौता करना पड़ता है जब औलादें नालायक़ हो जाती हैं अपने ऊपर ग़ुस्सा करना पड़ता है सच्चाई को अपनाना आसान नहीं दुनिया भर से झगड़ा करना पड़ता है जब सारे के सारे ही बे-पर्दा हों ऐसे में खु़द पर्दा करना पड़ता है प्यासों की बस्ती में शो'ले भड़का कर फिर पानी को महंगा करना पड़ता है हँस कर अपने चहरे की हर सिलवट पर शीशे को शर्मिंदा करना पड़ता है

Nawaz Deobandi

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मंज़िल पे न पहुँचे उसे रस्ता नहीं कहते दो चार क़दम चलने को चलना नहीं कहते इक हम हैं कि ग़ैरों को भी कह देते हैं अपना इक तुम हो कि अपनों को भी अपना नहीं कहते कम-हिम्मती ख़तरा है समुंदर के सफ़र में तूफ़ान को हम दोस्तो ख़तरा नहीं कहते बन जाए अगर बात तो सब कहते हैं क्या क्या और बात बिगड़ जाए तो क्या क्या नहीं कहते

Nawaz Deobandi

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वहाँ कैसे कोई दिया जले जहाँ दूर तक ये हवा न हो उन्हें हाल-ए-दिल न सुनाइए जिन्हें दर्द-ए-दिल का पता न हो हों अजब तरह की शिकायतें हों अजब तरह की इनायतें तुझे मुझ से शिकवे हज़ार हों मुझे तुझ से कोई गिला न हो कोई ऐसा शे'र भी दे ख़ुदा जो तिरी अता हो तिरी अता कभी जैसा मैं ने कहा न हो कभी जैसा मैं ने सुना न हो न दिए का है न हवा का है यहाँ जो भी कुछ है ख़ुदा का है यहाँ ऐसा कोई दिया नहीं जो जला हो और वो बुझा न हो मैं मरीज़-ए-इश्क़ हूँ चारा-गर तू है दर्द-ए-इश्क़ से बे-ख़बर ये तड़प ही उस का इलाज है ये तड़प न हो तो शिफ़ा न हो

Nawaz Deobandi

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