ghazalKuch Alfaaz

मंज़िल पे न पहुँचे उसे रस्ता नहीं कहते दो चार क़दम चलने को चलना नहीं कहते इक हम हैं कि ग़ैरों को भी कह देते हैं अपना इक तुम हो कि अपनों को भी अपना नहीं कहते कम-हिम्मती ख़तरा है समुंदर के सफ़र में तूफ़ान को हम दोस्तो ख़तरा नहीं कहते बन जाए अगर बात तो सब कहते हैं क्या क्या और बात बिगड़ जाए तो क्या क्या नहीं कहते

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी

Zubair Ali Tabish

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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ले के माज़ी को जो हाल आया तो दिल काँप गया जब कभी उन का ख़याल आया तो दिल काँप गया ऐसा तोड़ा था मुहब्बत में किसी ने दिल को जब किसी शीशे में बाल आया तो दिल काँप गया सर बुलंदी पे तो मग़रूर थे हम भी लेकिन चढ़ते सूरज पे ज़वाल आया तो दिल काँप गया बद-नज़र उठने ही वाली थी किसी की जानिब अपने बेटी का ख़याल आया तो दिल काँप गया

Nawaz Deobandi

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वहाँ कैसे कोई दिया जले जहाँ दूर तक ये हवा न हो उन्हें हाल-ए-दिल न सुनाइए जिन्हें दर्द-ए-दिल का पता न हो हों अजब तरह की शिकायतें हों अजब तरह की इनायतें तुझे मुझ से शिकवे हज़ार हों मुझे तुझ से कोई गिला न हो कोई ऐसा शे'र भी दे ख़ुदा जो तिरी अता हो तिरी अता कभी जैसा मैं ने कहा न हो कभी जैसा मैं ने सुना न हो न दिए का है न हवा का है यहाँ जो भी कुछ है ख़ुदा का है यहाँ ऐसा कोई दिया नहीं जो जला हो और वो बुझा न हो मैं मरीज़-ए-इश्क़ हूँ चारा-गर तू है दर्द-ए-इश्क़ से बे-ख़बर ये तड़प ही उस का इलाज है ये तड़प न हो तो शिफ़ा न हो

Nawaz Deobandi

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ख़ुद को कितना छोटा करना पड़ता है बेटे से समझौता करना पड़ता है जब औलादें नालायक़ हो जाती हैं अपने ऊपर ग़ुस्सा करना पड़ता है सच्चाई को अपनाना आसान नहीं दुनिया भर से झगड़ा करना पड़ता है जब सारे के सारे ही बे-पर्दा हों ऐसे में खु़द पर्दा करना पड़ता है प्यासों की बस्ती में शो'ले भड़का कर फिर पानी को महंगा करना पड़ता है हँस कर अपने चहरे की हर सिलवट पर शीशे को शर्मिंदा करना पड़ता है

Nawaz Deobandi

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