ghazalKuch Alfaaz

मिरा है कौन दुश्मन मेरी चाहत कौन रखता है इसी पर सोचते रहने की फ़ुर्सत कौन रखता है मकीनों के तअल्लुक़ ही से याद आती है हर बस्ती वगरना सिर्फ़ बाम-ओ-दर से उल्फ़त कौन रखता है नहीं है निर्ख़ कोई मेरे इन अशआर-ए-ताज़ा का ये मेरे ख़्वाब हैं ख़्वाबों की क़ीमत कौन रखता है दर-ए-ख़ेमा खुला रक्खा है गुल कर के दिया हम ने सो इज़्न-ए-आम है लो शौक़-रुख़्सत कौन रखता है मरे दुश्मन का क़द इस भीड़ में मुझ से तो ऊँचा हो यही में ढूँढ़ता हूँ ऐसी क़ामत कौन रखता है हमारे शहर की रौनक़ है कुछ मशहूर लोगों से मगर सब जानते हैं कैसी शोहरत कौन रखता है

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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी

Ali Zaryoun

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बात करनी है बात कौन करे दर्द से दो दो हाथ कौन करे हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं चाँद न हो तो रात कौन करे अब तुझे रब कहें या बुत समझें इश्क़ में ज़ात-पात कौन करे ज़िंदगी भर की थे कमाई तुम इस से ज़्यादा ज़कात कौन करे

Kumar Vishwas

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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छोटे छोटे कई बे-फ़ैज़ मफ़ादात के साथ लोग ज़िंदा हैं अजब सूरत-ए-हालात के साथ फ़ैसला ये तो बहर-हाल तुझे करना है ज़ेहन के साथ सुलगना है कि जज़्बात के साथ गुफ़्तुगू देर से जारी है नतीजे के बग़ैर इक नई बात निकल आती है हर बात के साथ अब के ये सोच के तुम ज़ख़्म-ए-जुदाई देना दिल भी बुझ जाएगा ढलती हुई इस रात के साथ तुम वही हो कि जो पहले थे मिरी नज़रों में क्या इज़ाफ़ा हुआ इन अतलस ओ बानात के साथ इतना पसपा न हो दीवार से लग जाएगा इतने समझौते न कर सूरत-ए-हालात के साथ भेजता रहता है गुम-नाम ख़तों में कुछ फूल इस क़दर किस को मोहब्बत है मिरी ज़ात के साथ

Aitbar Sajid

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घर की दहलीज़ से बाज़ार में मत आ जाना तुम किसी चश्म-ए-ख़रीदार में मत आ जाना ख़ाक उड़ाना इन्हीं गलियों में भला लगता है चलते फिरते किसी दरबार में मत आ जाना यूँँही ख़ुशबू की तरह फैलते रहना हर सू तुम किसी दाम-ए-तलबगार में मत आ जाना दूर साहिल पे खड़े रह के तमाशा करना किसी उम्मीद के मँझधार में मत आ जाना अच्छे लगते हो कि ख़ुद-सर नहीं ख़ुद्दार हो तुम हाँ सिमट के बुत-ए-पिंदार में मत आ जाना चाँद कहता हूँ तो मतलब न ग़लत लेना तुम रात को रौज़न-ए-दीवार में मत आ जाना

Aitbar Sajid

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तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो मैं बहुत दिनों से उदास हूँ मुझे कोई शाम उधार दो मुझे अपने रूप की धूप दो कि चमक सकें मिरे ख़ाल-ओ-ख़द मुझे अपने रंग में रंग दो मिरे सारे रंग उतार दो किसी और को मिरे हाल से न ग़रज़ है कोई न वास्ता मैं बिखर गया हूँ समेट लो मैं बिगड़ गया हूँ सँवार दो

Aitbar Sajid

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जो ख़याल थे न क़यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए जो मोहब्बतों की असास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए जिन्हें मानता ही नहीं ये दिल वही लोग मेरे हैं हम-सफ़र मुझे हर तरह से जो रास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए मुझे लम्हा-भर की रफ़ाक़तों के सराब और सताएँगे मिरी उम्र-भर की जो प्यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए ये ख़याल सारे हैं आरज़ी ये गुलाब सारे हैं काग़ज़ी गुल-ए-आरज़ू की जो बास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए जिन्हें कर सका न क़ुबूल मैं वो शरीक-ए-राह-ए-सफ़र हुए जो मिरी तलब मिरी आस थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए मिरी धड़कनों के क़रीब थे मिरी चाह थे मिरा ख़्वाब थे वो जो रोज़-ओ-शब मिरे पास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए

Aitbar Sajid

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मुझ से मुख़्लिस था न वाक़िफ़ मिरे जज़्बात से था उस का रिश्ता तो फ़क़त अपने मफ़ादात से था अब जो बिछड़ा है तो क्या रोएँ जुदाई पे तिरी यही अंदेशा हमें पहली मुलाक़ात से था दिल के बुझने का हवाओं से गिला क्या करना ये दिया नज़्अ' के आलम में तो कल रात से था मरकज़-ए-शहर में रहने पे मुसिर थी ख़िल्क़त और मैं वाबस्ता तिरे दिल के मज़ाफ़ात से था मैं ख़राबों का मकीं और तअ'ल्लुक़ मेरा तेरे नाते कभी ख़्वाबों के महल्लात से था लब-कुशाई पे खुला उस के सुख़न से इफ़्लास कितना आरास्ता वो अत्लस-ओ-बानात से था

Aitbar Sajid

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