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जो ख़याल थे न क़यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए जो मोहब्बतों की असास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए जिन्हें मानता ही नहीं ये दिल वही लोग मेरे हैं हम-सफ़र मुझे हर तरह से जो रास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए मुझे लम्हा-भर की रफ़ाक़तों के सराब और सताएँगे मिरी उम्र-भर की जो प्यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए ये ख़याल सारे हैं आरज़ी ये गुलाब सारे हैं काग़ज़ी गुल-ए-आरज़ू की जो बास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए जिन्हें कर सका न क़ुबूल मैं वो शरीक-ए-राह-ए-सफ़र हुए जो मिरी तलब मिरी आस थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए मिरी धड़कनों के क़रीब थे मिरी चाह थे मिरा ख़्वाब थे वो जो रोज़-ओ-शब मिरे पास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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घर की दहलीज़ से बाज़ार में मत आ जाना तुम किसी चश्म-ए-ख़रीदार में मत आ जाना ख़ाक उड़ाना इन्हीं गलियों में भला लगता है चलते फिरते किसी दरबार में मत आ जाना यूँँही ख़ुशबू की तरह फैलते रहना हर सू तुम किसी दाम-ए-तलबगार में मत आ जाना दूर साहिल पे खड़े रह के तमाशा करना किसी उम्मीद के मँझधार में मत आ जाना अच्छे लगते हो कि ख़ुद-सर नहीं ख़ुद्दार हो तुम हाँ सिमट के बुत-ए-पिंदार में मत आ जाना चाँद कहता हूँ तो मतलब न ग़लत लेना तुम रात को रौज़न-ए-दीवार में मत आ जाना

Aitbar Sajid

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छोटे छोटे कई बे-फ़ैज़ मफ़ादात के साथ लोग ज़िंदा हैं अजब सूरत-ए-हालात के साथ फ़ैसला ये तो बहर-हाल तुझे करना है ज़ेहन के साथ सुलगना है कि जज़्बात के साथ गुफ़्तुगू देर से जारी है नतीजे के बग़ैर इक नई बात निकल आती है हर बात के साथ अब के ये सोच के तुम ज़ख़्म-ए-जुदाई देना दिल भी बुझ जाएगा ढलती हुई इस रात के साथ तुम वही हो कि जो पहले थे मिरी नज़रों में क्या इज़ाफ़ा हुआ इन अतलस ओ बानात के साथ इतना पसपा न हो दीवार से लग जाएगा इतने समझौते न कर सूरत-ए-हालात के साथ भेजता रहता है गुम-नाम ख़तों में कुछ फूल इस क़दर किस को मोहब्बत है मिरी ज़ात के साथ

Aitbar Sajid

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मिरा है कौन दुश्मन मेरी चाहत कौन रखता है इसी पर सोचते रहने की फ़ुर्सत कौन रखता है मकीनों के तअल्लुक़ ही से याद आती है हर बस्ती वगरना सिर्फ़ बाम-ओ-दर से उल्फ़त कौन रखता है नहीं है निर्ख़ कोई मेरे इन अशआर-ए-ताज़ा का ये मेरे ख़्वाब हैं ख़्वाबों की क़ीमत कौन रखता है दर-ए-ख़ेमा खुला रक्खा है गुल कर के दिया हम ने सो इज़्न-ए-आम है लो शौक़-रुख़्सत कौन रखता है मरे दुश्मन का क़द इस भीड़ में मुझ से तो ऊँचा हो यही में ढूँढ़ता हूँ ऐसी क़ामत कौन रखता है हमारे शहर की रौनक़ है कुछ मशहूर लोगों से मगर सब जानते हैं कैसी शोहरत कौन रखता है

Aitbar Sajid

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मुझ से मुख़्लिस था न वाक़िफ़ मिरे जज़्बात से था उस का रिश्ता तो फ़क़त अपने मफ़ादात से था अब जो बिछड़ा है तो क्या रोएँ जुदाई पे तिरी यही अंदेशा हमें पहली मुलाक़ात से था दिल के बुझने का हवाओं से गिला क्या करना ये दिया नज़्अ' के आलम में तो कल रात से था मरकज़-ए-शहर में रहने पे मुसिर थी ख़िल्क़त और मैं वाबस्ता तिरे दिल के मज़ाफ़ात से था मैं ख़राबों का मकीं और तअ'ल्लुक़ मेरा तेरे नाते कभी ख़्वाबों के महल्लात से था लब-कुशाई पे खुला उस के सुख़न से इफ़्लास कितना आरास्ता वो अत्लस-ओ-बानात से था

Aitbar Sajid

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तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो मैं बहुत दिनों से उदास हूँ मुझे कोई शाम उधार दो मुझे अपने रूप की धूप दो कि चमक सकें मिरे ख़ाल-ओ-ख़द मुझे अपने रंग में रंग दो मिरे सारे रंग उतार दो किसी और को मिरे हाल से न ग़रज़ है कोई न वास्ता मैं बिखर गया हूँ समेट लो मैं बिगड़ गया हूँ सँवार दो

Aitbar Sajid

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