मेरे हम-नफ़स मेरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँ-ब-लब मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे मेरे दाग़-ए-दिल से है रौशनी इसी रौशनी से है ज़िंदगी मुझे डर है ऐ मिरे चारा-गर ये चराग़ तू ही बुझा न दे मुझे छोड़ दे मिरे हाल पर तिरा क्या भरोसा है चारा-गर ये तिरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर मिरा दर्द और बढ़ा न दे मेरा अज़्म इतना बुलंद है कि पराए शोलों का डर नहीं मुझे ख़ौफ़ आतिश-ए-गुल से है ये कहीं चमन को जला न दे वो उठे हैं ले के ख़ुम-ओ-सुबू अरे ओ 'शकील' कहाँ है तू तिरा जाम लेने को बज़्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है
Umair Najmi
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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा
Tehzeeb Hafi
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न सोचा था ये दिल लगाने से पहले कि टूटेगा दिल मुस्कुराने से पहले उमीदों का सूरज न चमका न डूबा गहन पड़ गया जगमगाने से पहले अगर ग़म उठाना था क़िस्मत में अपनी ख़ुशी क्यूँँ मिली ग़म उठाने से पहले कहो बिजलियों से न दिल को जलाएँ मुझे फूँक दें घर जलाने से पहले
Shakeel Badayuni
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मिरी ज़िंदगी पे न मुस्कुरा मुझे ज़िंदगी का अलम नहीं जिसे तेरे ग़म से हो वास्ता वो ख़िज़ाँ बहार से कम नहीं मिरा कुफ़्र हासिल-ए-ज़ोहद है मिरा ज़ोहद हासिल-ए-कुफ़्र है मिरी बंदगी वो है बंदगी जो रहीन-ए-दैर-ओ-हरम नहीं मुझे रास आएँ ख़ुदा करे यही इश्तिबाह की साअ'तें उन्हें ऐतबार-ए-वफ़ा तो है मुझे ऐतबार-ए-सितम नहीं वही कारवाँ वही रास्ते वही ज़िंदगी वही मरहले मगर अपने अपने मक़ाम पर कभी तुम नहीं कभी हम नहीं न वो शान-ए-जब्र-ए-शबाब है न वो रंग-ए-क़हर-ए-इताब है दिल-ए-बे-क़रार पे इन दिनों है सितम यही कि सितम नहीं न फ़ना मिरी न बक़ा मिरी मुझे ऐ 'शकील' न ढूँढ़िए मैं किसी का हुस्न-ए-ख़याल हूँ मिरा कुछ वजूद ओ अदम नहीं
Shakeel Badayuni
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कोई आरज़ू नहीं है कोई मुद्दआ' नहीं है तिरा ग़म रहे सलामत मिरे दिल में क्या नहीं है कहाँ जाम-ए-ग़म की तल्ख़ी कहाँ ज़िंदगी का दरमाँ मुझे वो दवा मिली है जो मिरी दवा नहीं है तू बचाए लाख दामन मिरा फिर भी है ये दावा तिरे दिल में मैं ही मैं हूँ कोई दूसरा नहीं है तुम्हें कह दिया सितम-गर ये क़ुसूर था ज़बां का मुझे तुम मुआ'फ़ कर दो मिरा दिल बुरा नहीं है मुझे दोस्त कहने वाले ज़रा दोस्ती निभा दे ये मुतालबा है हक़ का कोई इल्तिजा नहीं है ये उदास उदास चेहरे ये हसीं हसीं तबस्सुम तिरी अंजुमन में शायद कोई आइना नहीं है मिरी आँख ने तुझे भी ब-ख़ुदा 'शकील' पाया मैं समझ रहा था मुझ सा कोई दूसरा नहीं है
Shakeel Badayuni
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अब तो ख़ुशी का ग़म है न ग़म की ख़ुशी मुझे बे-हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे वो वक़्त भी ख़ुदा न दिखाए कभी मुझे उन की नदामतों पे हो शर्मिंदगी मुझे रोने पे अपने उन को भी अफ़्सुर्दा देख कर यूँँ बन रहा हूँ जैसे अब आई हँसी मुझे यूँँंदीजिए फ़रेब-ए-मोहब्बत कि उम्र भर मैं ज़िंदगी को याद करूँँ ज़िंदगी मुझे रखना है तिश्ना-काम तो साक़ी बस इक नज़र सैराब कर न दे मिरी तिश्ना-लबी मुझे पाया है सब ने दिल मगर इस दिल के बावजूद इक शय मिली है दिल में खटकती हुई मुझे राज़ी हों या ख़फ़ा हों वो जो कुछ भी हों 'शकील' हर हाल में क़ुबूल है उन की ख़ुशी मुझे
Shakeel Badayuni
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कैसे कह दूँ की मुलाक़ात नहीं होती है रोज़ मिलते हैं मगर बात नहीं होती है आप लिल्लाह न देखा करें आईना कभी दिल का आ जाना बड़ी बात नहीं होती है छुप के रोता हूँ तिरी याद में दुनिया भर से कब मिरी आँख से बरसात नहीं होती है हाल-ए-दिल पूछने वाले तिरी दुनिया में कभी दिन तो होता है मगर रात नहीं होती है जब भी मिलते हैं तो कहते हैं कि कैसे हो 'शकील' इस से आगे तो कोई बात नहीं होती है
Shakeel Badayuni
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