ghazalKuch Alfaaz

अब तो ख़ुशी का ग़म है न ग़म की ख़ुशी मुझे बे-हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे वो वक़्त भी ख़ुदा न दिखाए कभी मुझे उन की नदामतों पे हो शर्मिंदगी मुझे रोने पे अपने उन को भी अफ़्सुर्दा देख कर यूँँ बन रहा हूँ जैसे अब आई हँसी मुझे यूँँंदीजिए फ़रेब-ए-मोहब्बत कि उम्र भर मैं ज़िंदगी को याद करूँँ ज़िंदगी मुझे रखना है तिश्ना-काम तो साक़ी बस इक नज़र सैराब कर न दे मिरी तिश्ना-लबी मुझे पाया है सब ने दिल मगर इस दिल के बावजूद इक शय मिली है दिल में खटकती हुई मुझे राज़ी हों या ख़फ़ा हों वो जो कुछ भी हों 'शकील' हर हाल में क़ुबूल है उन की ख़ुशी मुझे

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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

Umair Najmi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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न सोचा था ये दिल लगाने से पहले कि टूटेगा दिल मुस्कुराने से पहले उमीदों का सूरज न चमका न डूबा गहन पड़ गया जगमगाने से पहले अगर ग़म उठाना था क़िस्मत में अपनी ख़ुशी क्यूँँ मिली ग़म उठाने से पहले कहो बिजलियों से न दिल को जलाएँ मुझे फूँक दें घर जलाने से पहले

Shakeel Badayuni

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मिरी ज़िंदगी पे न मुस्कुरा मुझे ज़िंदगी का अलम नहीं जिसे तेरे ग़म से हो वास्ता वो ख़िज़ाँ बहार से कम नहीं मिरा कुफ़्र हासिल-ए-ज़ोहद है मिरा ज़ोहद हासिल-ए-कुफ़्र है मिरी बंदगी वो है बंदगी जो रहीन-ए-दैर-ओ-हरम नहीं मुझे रास आएँ ख़ुदा करे यही इश्तिबाह की साअ'तें उन्हें ऐतबार-ए-वफ़ा तो है मुझे ऐतबार-ए-सितम नहीं वही कारवाँ वही रास्ते वही ज़िंदगी वही मरहले मगर अपने अपने मक़ाम पर कभी तुम नहीं कभी हम नहीं न वो शान-ए-जब्र-ए-शबाब है न वो रंग-ए-क़हर-ए-इताब है दिल-ए-बे-क़रार पे इन दिनों है सितम यही कि सितम नहीं न फ़ना मिरी न बक़ा मिरी मुझे ऐ 'शकील' न ढूँढ़िए मैं किसी का हुस्न-ए-ख़याल हूँ मिरा कुछ वजूद ओ अदम नहीं

Shakeel Badayuni

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कोई आरज़ू नहीं है कोई मुद्दआ' नहीं है तिरा ग़म रहे सलामत मिरे दिल में क्या नहीं है कहाँ जाम-ए-ग़म की तल्ख़ी कहाँ ज़िंदगी का दरमाँ मुझे वो दवा मिली है जो मिरी दवा नहीं है तू बचाए लाख दामन मिरा फिर भी है ये दावा तिरे दिल में मैं ही मैं हूँ कोई दूसरा नहीं है तुम्हें कह दिया सितम-गर ये क़ुसूर था ज़बां का मुझे तुम मुआ'फ़ कर दो मिरा दिल बुरा नहीं है मुझे दोस्त कहने वाले ज़रा दोस्ती निभा दे ये मुतालबा है हक़ का कोई इल्तिजा नहीं है ये उदास उदास चेहरे ये हसीं हसीं तबस्सुम तिरी अंजुमन में शायद कोई आइना नहीं है मिरी आँख ने तुझे भी ब-ख़ुदा 'शकील' पाया मैं समझ रहा था मुझ सा कोई दूसरा नहीं है

Shakeel Badayuni

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कैसे कह दूँ की मुलाक़ात नहीं होती है रोज़ मिलते हैं मगर बात नहीं होती है आप लिल्लाह न देखा करें आईना कभी दिल का आ जाना बड़ी बात नहीं होती है छुप के रोता हूँ तिरी याद में दुनिया भर से कब मिरी आँख से बरसात नहीं होती है हाल-ए-दिल पूछने वाले तिरी दुनिया में कभी दिन तो होता है मगर रात नहीं होती है जब भी मिलते हैं तो कहते हैं कि कैसे हो 'शकील' इस से आगे तो कोई बात नहीं होती है

Shakeel Badayuni

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मेरे हम-नफ़स मेरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँ-ब-लब मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे मेरे दाग़-ए-दिल से है रौशनी इसी रौशनी से है ज़िंदगी मुझे डर है ऐ मिरे चारा-गर ये चराग़ तू ही बुझा न दे मुझे छोड़ दे मिरे हाल पर तिरा क्या भरोसा है चारा-गर ये तिरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर मिरा दर्द और बढ़ा न दे मेरा अज़्म इतना बुलंद है कि पराए शोलों का डर नहीं मुझे ख़ौफ़ आतिश-ए-गुल से है ये कहीं चमन को जला न दे वो उठे हैं ले के ख़ुम-ओ-सुबू अरे ओ 'शकील' कहाँ है तू तिरा जाम लेने को बज़्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे

Shakeel Badayuni

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