मोहब्बतों के सफ़र पर निकल के देखूँगा ये पुल-सिरात अगर है तो चल के देखूँगा सवाल ये है कि रफ़्तार किस की कितनी है मैं आफ़्ताब से आगे निकल के देखूँगा मज़ाक़ अच्छा रहेगा ये चाँद-तारों से मैं आज शाम से पहले ही ढल के देखूँगा वो मेरे हुक्म को फ़रियाद जान लेता है अगर ये सच है तो लहजा बदल के देखूँगा उजाले बाँटने वालों पे क्या गुज़रती है किसी चराग़ की मानिंद जल के देखूँगा अजब नहीं कि वही रौशनी मुझ मिल जाए मैं अपने घर से किसी दिन निकल के देखूँगा
Related Ghazal
सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
140 likes
मैं ने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझ को ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं मैं ने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो
Jawwad Sheikh
50 likes
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जाएगा हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िंदगी ने कह दिया तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जाएगा मैं ख़ुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तो ज़हर भी इस में अगर होगा दवा हो जाएगा सब उसी के हैं हवा ख़ुशबू ज़मीन ओ आसमाँ मैं जहाँ भी जाऊँगा उस को पता हो जाएगा
Bashir Badr
43 likes
सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझ को ख़ानदानी चाहिए शहर की सारी अलिफ़-लैलाएँ बूढ़ी हो चुकीं शाहज़ादे को कोई ताज़ा कहानी चाहिए मैं ने ऐ सूरज तुझे पूजा नहीं समझा तो है मेरे हिस्से में भी थोड़ी धूप आनी चाहिए मेरी क़ीमत कौन दे सकता है इस बाज़ार में तुम ज़ुलेख़ा हो तुम्हें क़ीमत लगानी चाहिए ज़िंदगी है इक सफ़र और ज़िंदगी की राह में ज़िंदगी भी आए तो ठोकर लगानी चाहिए मैं ने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए
Rahat Indori
38 likes
ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं शुक्रिया मश्वरत का चलते हैं हो रहा हूँ मैं किस तरह बर्बाद देखने वाले हाथ मलते हैं है वो जान अब हर एक महफ़िल की हम भी अब घर से कम निकलते हैं क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं है उसे दूर का सफ़र दर-पेश हम सँभाले नहीं सँभलते हैं तुम बनो रंग तुम बनो ख़ुश्बू हम तो अपने सुख़न में ढलते हैं मैं उसी तरह तो बहलता हूँ और सब जिस तरह बहलते हैं है अजब फ़ैसले का सहरा भी चल न पड़िए तो पाँव जलते हैं
Jaun Elia
38 likes
More from Rahat Indori
यूँँ सदा देते हुए तेरे ख़याल आते हैं जैसे का'बे की खुली छत पे बिलाल आते हैं रोज़ हम अश्कों से धो आते हैं दीवार-ए-हरम पगड़ियाँ रोज़ फ़रिश्तों की उछाल आते हैं हाथ अभी पीछे बंधे रहते हैं चुप रहते हैं देखना ये है तुझे कितने कमाल आते हैं चाँद सूरज मिरी चौखट पे कई सदियों से रोज़ लिक्खे हुए चेहरे पे सवाल आते हैं बे-हिसी मुर्दा-दिली रक़्स शराबें नग़्में बस इसी राह से क़ौमों पे ज़वाल आते हैं
Rahat Indori
3 likes
चेहरों की धूप आँखों की गहराई ले गया आईना सारे शहर की बीनाई ले गया डूबे हुए जहाज़ पे क्या तब्सिरा करें ये हादिसा तो सोच की गहराई ले गया हालाँकि बे-ज़बान था लेकिन अजीब था जो शख़्स मुझ से छीन के गोयाई ले गया मैं आज अपने घर से निकलने न पाऊँगा बस इक क़मीस थी जो मिरा भाई ले गया 'ग़ालिब' तुम्हारे वास्ते अब कुछ नहीं रहा गलियों के सारे संग तो सौदाई ले गया
Rahat Indori
19 likes
इसे सामान-ए-सफ़र जान ये जुगनू रख ले राह में तीरगी होगी मिरे आँसू रख ले तू जो चाहे तो तिरा झूट भी बिक सकता है शर्त इतनी है कि सोने की तराज़ू रख ले वो कोई जिस्म नहीं है कि उसे छू भी सकें हाँ अगर नाम ही रखना है तो ख़ुश्बू रख ले तुझ को अन-देखी बुलंदी में सफ़र करना है एहतियातन मिरी हिम्मत मिरे बाज़ू रख ले मिरी ख़्वाहिश है कि आँगन में न दीवार उठे मिरे भाई मिरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले
Rahat Indori
0 likes
ये ख़ाक-ज़ादे जो रहते हैं बे-ज़बान पड़े इशारा कर दें तो सूरज ज़मीं पे आन पड़े सुकूत-ए-ज़ीस्त को आमादा-ए-बग़ावत कर लहू उछाल कि कुछ ज़िंदगी में जान पड़े हमारे शहर की बीनाइयों पे रोते हैं तमाम शहर के मंज़र लहू-लुहान पड़े उठे हैं हाथ मिरे हुर्मत-ए-ज़मीं के लिए मज़ा जब आए कि अब पाँव आसमान पड़े किसी मकीन की आमद के इंतिज़ार में हैं मिरे मोहल्ले में ख़ाली कई मकान पड़े
Rahat Indori
7 likes
दिए बुझे हैं मगर दूर तक उजाला है ये आप आए हैं या दिन निकलने वाला है ख़याल में भी तेरा अक़्स देखने के बा'द जो शख़्स होश गँवा दे वो दोश वाला है जवाब देने के अन्दाज़ भी निराले हैं सलाम करने का अन्दाज़ भी निराला है सुनहरी धूप है सदक़ा तेरे तबस्सुम का ये चाँदनी तेरी परछाईं का उजाला है है तेरे पैरों की आहट ज़मीन की गर्दिश ये आ समाँ तेरी अँगड़ाई का हवाला है
Rahat Indori
4 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Rahat Indori.
Similar Moods
More moods that pair well with Rahat Indori's ghazal.







