ghazalKuch Alfaaz

न पूछ क्यूँँ मिरी आँखों में आ गए आँसू जो तेरे दिल में है उस बात पर नहीं आए वफ़ा-ए-अहद है ये पा-शिकस्तगी तो नहीं ठहर गया कि मिरे हम-सफ़र नहीं आए न छेड़ उन को ख़ुदा के लिए कि अहल-ए-वफ़ा भटक गए हैं तो फिर राह पर नहीं आए अभी अभी वो गए हैं मगर ये आलम है बहुत दिनों से वो जैसे नज़र नहीं आए कहीं ये तर्क-ए-मोहब्बत की इब्तिदा तो नहीं वो मुझ को याद कभी इस क़दर नहीं आए अजीब मंज़िल-ए-दिलकश अदम की मंज़िल है मुसाफ़िरान-ए-अदम लौट कर नहीं आए हफ़ीज़ कब उन्हें देखा नहीं ब-रंग-ए-दिगर 'हफ़ीज़' कब वो ब-रंग-ए-दिगर नहीं आए

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा

Tehzeeb Hafi

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आईने आँख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था एक याद बसर करती थी मुझे मैं साँस नहीं ले पाता था एक शख़्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी रोता था तो रात उजड़ जाती हँसता था तो दिन बन जाता था मैं रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जा कर वो फोन उठाता था मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था हम एक ज़िंदान में ज़िंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था वो जिस्म नज़र-अंदाज़ नहीं हो पाता था इन आँखों से मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था

Tehzeeb Hafi

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आज उन्हें कुछ इस तरह जी खोल कर देखा किए एक ही लम्हे में जैसे उम्र-भर देखा किए दिल अगर बेताब है दिल का मुक़द्दर है यही जिस क़दर थी हम को तौफ़ीक़-ए-नज़र देखा किए ख़ुद-फ़रोशाना अदा थी मेरी सूरत देखना अपने ही जल्वे ब-अंदाज़-ए-दिगर देखा किए ना-शनास-ए-ग़म फ़क़त दाद-ए-हुनर देते रहे हम मता-ए-ग़म को रुस्वा-ए-हुनर देखा किए देखने का अब ये आलम है कोई हो या न हो हम जिधर देखा किए पहरों उधर देखा किए हुस्न को देखा है मैं ने हुस्न की ख़ातिर 'हफ़ीज़' वर्ना सब अपना ही मेयार-ए-नज़र देखा किए

Hafeez Hoshiarpuri

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कुछ इस तरह से नज़र से गुज़र गया कोई कि दिल को ग़म का सज़ा-वार कर गया कोई दिल-ए-सितम-ज़दा को जैसे कुछ हुआ ही नहीं ख़ुद अपने हुस्न से यूँँ बे-ख़बर गया कोई वो एक जल्वा-ए-सद-रंग इक हुजूम-ए-बहार न जाने कौन था जाने किधर गया कोई नज़र कि तिश्ना-ए-दीदार थी रही महरूम नज़र उठाई तो दिल में उतर गया कोई निगाह-ए-शौक़ की महरूमियों से ना-वाक़िफ़ निगाह-ए-शौक़ पे इल्ज़ाम धर गया कोई अब उन के हुस्न में हुस्न-ए-नज़र भी शामिल है कुछ और मेरी नज़र से सँवर गया कोई किसी के पाँव की आहट कि दिल की धड़कन थी हज़ार बार उठा सू-ए-दर गया कोई नसीब-ए-अहल-ए-वफ़ा ये सुकून-ए-दिल तो न था ज़रूर नाला-ए-दिल बे-असर गया कोई उठा फिर आज मिरे दिल में रश्क का तूफ़ाँ फिर उन की राह से बा-चश्म-ए-तर गया कोई ये कह के याद करेंगे 'हफ़ीज़' दोस्त मुझे वफ़ा की रस्म को पाइंदा कर गया कोई

Hafeez Hoshiarpuri

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नर्गिस पे तो इल्ज़ाम लगा बे-बसरी का अरबाब-ए-गुलिस्ताँ पे नहीं कम-नज़री का तौफ़ीक़-ए-रिफ़ाक़त नहीं उन को सर-ए-मंज़िल रस्ते में जिन्हें पास रहा हम-सफ़री का अब ख़ानका ओ मदरसा ओ मय-कदा हैं एक इक सिलसिला है क़ाफ़िला-ए-बे-ख़बरी का हर नक़्श है आईना-ए-नैरंग-ए-तमाशा दुनिया है कि हासिल मिरी हैराँ-नज़री का अब फ़र्श से ता-अर्श ज़बूँ-हाल है फ़ितरत इक म'अरका दर-पेश है अज़्म-ए-बशरी का कब मिलती है ये दौलत-ए-बेदार किसी को और मैं हूँ कि रोना है इसी दीदा-वरी का बे-वासता-ए-इश्क़ भी रंग-ए-रुख़-ए-परवेज़ उनवान है फ़रहाद की ख़ूनीं-जिगरी का आख़िर तिरे दर पे मुझे ले आई मोहब्बत देखा न गया हाल मिरी दर-बदरी का दिल में हो फ़क़त तुम ही तुम आँखों पे न जाओ आँखों को तो है रोग परेशाँ-नज़री का बे-पैरवी-ए-'मीर' 'हफ़ीज़' अपनी रविश है हम पर कोई इल्ज़ाम नहीं कम-हुनरी का

Hafeez Hoshiarpuri

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तमाम उम्र तिरा इंतिज़ार हम ने किया इस इंतिज़ार में किस किस से प्यार हम ने किया तलाश-ए-दोस्त को इक उम्र चाहिए ऐ दोस्त कि एक उम्र तिरा इंतिज़ार हम ने किया तेरे ख़याल में दिल शादमाँ रहा बरसों तिरे हुज़ूर उसे सोगवार हम ने किया ये तिश्नगी है के उन से क़रीब रह कर भी 'हफ़ीज़' याद उन्हें बार बार हम ने किया

Hafeez Hoshiarpuri

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रौशनी सी कभी कभी दिल में मंज़िल-ए-बे-निशाँ से आती है लौट कर नूर की किरन जैसे सफ़र-ए-ला-मकाँ से आती है नौ-ए-इंसाँ है गोश-बर-आवाज़ क्या ख़बर किस जहाँ से आती है अपनी फ़रियाद बाज़गश्त न हो इक सदा आसमाँ से आती है तख़्ता-ए-दार है कि तख़्ता-ए-गुल बू-ए-ख़ूँ गुलिस्ताँ से आती है दिल से आती है बात लब पे 'हफ़ीज़' बात दिल में कहाँ से आती है

Hafeez Hoshiarpuri

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