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पड़े पड़े नई ज़र-ख़ेज़ियाँ निकल आईं कटे दरख़्त में फिर टहनियाँ निकल आईं उस आइने में था सरसब्ज़ बाग़ का मंज़र छुआ जो मैं ने तो दो तितलियाँ निकल आईं मैं तोड़ डाला गया तो इमारत-ए-जाँ में कहाँ कहाँ से मिरी चाबियाँ निकल आईं मैं आसमान पे पहुँचा तो लड़खड़ाने लगा बुलंदियों में अजब पस्तियाँ निकल आईं ठहर गए तो मुयस्सर हुई न जा-ए-अमाँ जो चल पड़े तो कई बस्तियाँ निकल आईं वही नसीब कि मैं शहरयार जिस से बना उसी नसीब में तंग-दस्तियाँ निकल आईं मिरे इलाज को अल्लाह इस्तक़ामत दे मिरे मरीज़ की फिर पस्लियाँ निकल आईं मैं आसमान से उतरा ज़मीन की जानिब ज़मीं से मेरी तरफ़ सीढ़ियाँ निकल आईं वही सूराख़ जहाँ छिपकिली का डेरा था उसी सूराख़ से फिर च्यूँँंटियाँ निकल आईं अभी अभी तो सँभाला गया था गर्द-ओ-ग़ुबार हिसार-ए-दश्त में फिर आँधियाँ निकल आईं सँभाल रखा था अम्मी ने जिस को मौत तलक उसी कबाड़ से कुछ तख़्तियाँ निकल आईं मैं आख़िरी था जिसे सरफ़राज़ होना था मिरे हुनर में भी कोताहियाँ निकल आईं

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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जब से तू मेरे साथ चल रहा है ऐसा लगता है सब बदल रहा है तुझ को छूना भी क्या मुसीबत है दोस्त, ये हाथ कल से जल रहा है उस के सोने पे रात होती है उस के उठने पे दिन निकल रहा है

Kafeel Rana

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सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जाएगा हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िंदगी ने कह दिया तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जाएगा मैं ख़ुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तो ज़हर भी इस में अगर होगा दवा हो जाएगा सब उसी के हैं हवा ख़ुशबू ज़मीन ओ आसमाँ मैं जहाँ भी जाऊँगा उस को पता हो जाएगा

Bashir Badr

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जो भी अफ़वाह था वो सच निकला शोर मचना था शोर मच निकला छिप गई बात हाथ कटने की ख़ून मेहँदी के साथ रच निकला दुख तो ये है कि तेरे बारे में जहाँ से जो सुना वो सच निकला सोचता हूँ वो ऐन मौक़े' पर कैसे मेरी हवस से बच निकला

Kushal Dauneria

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मिरे वजूद अभी ना-तवाँ नहीं होना फिर इस के ब'अद ये मौसम जवाँ नहीं होना किसे ख़बर थी कि महशर का होगा ये भी रंग ज़मीं का होना मगर आसमाँ नहीं होना हमें ख़बर है कि वहशत ठिकाने लगनी है हमारा जोश अभी राएगाँ नहीं होना वजूद अपना है और आप तय करेंगे हम कहाँ पे होना है हम को कहाँ नहीं होना अब इस के ब'अद सकत कुछ नहीं रही मुझ में अब इस से आगे का क़िस्सा बयाँ नहीं होना हमारी बस्ती का दुख है हमीं से पूछो मियाँ कि क़ब्रें होनी मगर आस्ताँ नहीं होना मक़ाम-ए-शुक्र है मेरे लिए कि मेरे मुरीद ये तेरा आज मिरा क़द्र-दाँ नहीं होना मैं ख़ानदान का सब से बड़ा मदारी हूँ तमाशा होता रहेगा यहाँ नहीं होना बस इतनी दूरी मुयस्सर रहेगी दोनों को कि फ़ासला भी कोई दरमियाँ नहीं होना अजब अज़ाब था कि अपने शहर-ए-अरमाँ में हमारे वास्ते जा-ए-अमाँ नहीं होना ये ज़ुल्म है कि मुनादी हो इम्तिहानों की फिर इस के ब'अद कोई इम्तिहाँ नहीं होना अजब सुपुर्दगी-ए-जाँ का मरहला था 'अली' हमारे होने का हम को गुमाँ नहीं होना

Liaqat Jafri

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अजीब लोग थे वो तितलियाँ बनाते थे समुंदरों के लिए सीपियाँ बनाते थे वही बनाते थे लोहे को तोड़ कर ताला फिर उस के बा'द वही चाबियाँ बनाते थे मेरे क़बीले में ता'लीम का रिवाज न था मिरे बुज़ुर्ग मगर तख़्तियाँ बनाते थे फ़ुज़ूल वक़्त में वो सारे शीशागर मिल कर सुहागनों के लिए चूड़ियाँ बनाते थे

Liaqat Jafri

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सर पे सजने को जो तय्यार है मेरे अंदर गर्द-आलूद सी दस्तार है मेरे अंदर जिस के मर जाने का एहसास बना रहता है मुझ से बढ़ कर कोई बीमार है मेरे अंदर रोज़ अश्कों की नई फ़स्ल उगा देता है एक बूढ़ा सा ज़मींदार है मेरे अंदर कितना घनघोर अँधेरा है मिरी रग रग में इस क़दर रौशनी दरकार है मेरे अंदर दब के मर जाऊँगा इक रोज़ मैं अपने नीचे एक गिरती हुई दीवार है मेरे अंदर कौन देता है ये हर वक़्त गवाही मेरी कौन ये मेरा तरफ़-दार है मेरे अंदर मेरे लिक्खे हुए हर लफ़्ज़ को झुटलाता है मुझ से बढ़ कर कोई फ़नकार है मेरे अंदर

Liaqat Jafri

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ये जो रह रह के सर-ए-दश्त हवा चलती है कितनी अच्छी है मगर कितना बुरा चलती है एक आसेब तआक़ुब में लगा रहता है मैं जो रुकता हूँ तो फिर उस की सदा चलती है हाए वो साँस कि रुकती है तो क्या रुकती है हाए वो आँख कि चलती है तो क्या चलती है पेश-ख़ेमा है किसी और नई वहशत का ये जो इतरा के अभी बाद-ए-सबा चलती है तीर चलते हैं लगातार सवाद-ए-जाँ में और तलवार कोई एक जुदा चलती है बीच दरिया के अजब जश्न बपा है यारो साथ कश्ती के कोई मौज-ए-बला चलती है आज कुछ और ही मंज़र है मिरे चारों तरफ़ ग़ैर-महसूस तरीक़े से हवा चलती है मैं ब-ज़ाहिर तो हूँ आसूदा प मेरे अंदर धी में धी में से कहीं आह-ओ-बुका चलती है यूँँ तो बेबाक बना फिरता है वो यारों में उस की आँखों में अजब शर्म-ओ-हया चलती है मेरे मौला जो रहे सिर्फ़ कहा तेरा रहे मेरे होंटों पे यही एक दुआ चलती है

Liaqat Jafri

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उसी के दम पे तो ये दोस्ती बची हुई थी हमारे बीच में जो हम-सरी बची हुई थी हमारे बीच में इक पुख़्तगी बची हुई थी बची हुई थी मगर आरज़ी बची हुई थी उसी के नूर से ये रौशनी बची हुई थी मिरे नसीब में जो तीरगी बची हुई थी उसी के दम पे मनाया था उस ने जश्न मिरा कि दुश्मनी में भी जो दोस्ती बची हुई थी कमाल ये था कि हम बहस हार बैठे थे हमारे लहजे की शाइस्तगी बची हुई थी अगरचे ख़त्म थे रिश्ते पड़ोसियों वाले हमारे बीच में हम सेायगी बची ही थी बदल चुका था वो अपना मिज़ाज मेरे लिए मगर दिखावे को इक बे-रुख़ी बची हुई थी उसी के नूर से पुर-नूर था ये सारा जहाँ हमारी आँख में जो रौशनी बची हुई थी अब इस मक़ाम पे पहुँचा दिया था हम ने इश्क़ जुनून ख़त्म था दीवानगी बची हुई थी उसी ने जोड़ के रक्खा हुआ था रिश्ते को हमारे बीच में जो बरहमी बची हुई थी इस एक बात की शर्मिंदगी ने मार दिया मिरे वजूद तिरी तिश्नगी बची हुई थी उबूर कर लिया सहरा तो फिर से लौट आए जुनून बाक़ी था आशुफ़्तगी बची हुई थी मैं गाहे-गाहे उसे याद कर ही लेता था इसी बहाने मिरी ज़िंदगी बची हुई थी उसी के दम पे पढ़े भी गए सुने भी गए हमारे लहजे में जो चाशनी बची हुई थी ज़माने तेरी हुनर-कोश रज़्म के हाथों मैं लुट चुका था मगर शाएरी बची हुई थी वो कौन राज़ था जिस को बयान कर न सके वो कौन बात थी जो 'जाफ़री' बची हुई थी

Liaqat Jafri

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