ghazalKuch Alfaaz

ये जो रह रह के सर-ए-दश्त हवा चलती है कितनी अच्छी है मगर कितना बुरा चलती है एक आसेब तआक़ुब में लगा रहता है मैं जो रुकता हूँ तो फिर उस की सदा चलती है हाए वो साँस कि रुकती है तो क्या रुकती है हाए वो आँख कि चलती है तो क्या चलती है पेश-ख़ेमा है किसी और नई वहशत का ये जो इतरा के अभी बाद-ए-सबा चलती है तीर चलते हैं लगातार सवाद-ए-जाँ में और तलवार कोई एक जुदा चलती है बीच दरिया के अजब जश्न बपा है यारो साथ कश्ती के कोई मौज-ए-बला चलती है आज कुछ और ही मंज़र है मिरे चारों तरफ़ ग़ैर-महसूस तरीक़े से हवा चलती है मैं ब-ज़ाहिर तो हूँ आसूदा प मेरे अंदर धी में धी में से कहीं आह-ओ-बुका चलती है यूँँ तो बेबाक बना फिरता है वो यारों में उस की आँखों में अजब शर्म-ओ-हया चलती है मेरे मौला जो रहे सिर्फ़ कहा तेरा रहे मेरे होंटों पे यही एक दुआ चलती है

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ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी

Zubair Ali Tabish

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चल दिए फेर कर नज़र तुम भी ग़ैर तो ग़ैर थे मगर तुम भी ये गली मेरे दिलरुबा की है दोस्तों ख़ैरियत इधर तुम भी मुझ पे लोगों के साथ हँसते हो लोग रोएँगे ख़ास कर तुम भी मुझ को ठुकरा दिया है दुनिया ने मैं तो मर जाऊँगा अगर तुम भी उस की गाड़ी तो जा चुकी 'ताबिश' अब उठो जाओ अपने घर तुम भी

Zubair Ali Tabish

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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है

Tehzeeb Hafi

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मैं ने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझ को ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं मैं ने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो

Jawwad Sheikh

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क्या ग़लतफ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं वो मुझे समझा तो सकता था कि ऐसा कुछ नहीं इश्क़ से बच कर भी बंदा कुछ नहीं होता मगर ये भी सच है इश्क़ में बंदे का बचता कुछ नहीं जाने कैसे राज़ सीने में लिए बैठा है वो ज़ह्र खा लेता है पर मुँह से उगलता कुछ नहीं शुक्र है कि उस ने मुझ सेे कह दिया कि कुछ तो है मैं उस सेे कहने ही वाला था कि अच्छा कुछ नहीं

Tehzeeb Hafi

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मिरे वजूद अभी ना-तवाँ नहीं होना फिर इस के ब'अद ये मौसम जवाँ नहीं होना किसे ख़बर थी कि महशर का होगा ये भी रंग ज़मीं का होना मगर आसमाँ नहीं होना हमें ख़बर है कि वहशत ठिकाने लगनी है हमारा जोश अभी राएगाँ नहीं होना वजूद अपना है और आप तय करेंगे हम कहाँ पे होना है हम को कहाँ नहीं होना अब इस के ब'अद सकत कुछ नहीं रही मुझ में अब इस से आगे का क़िस्सा बयाँ नहीं होना हमारी बस्ती का दुख है हमीं से पूछो मियाँ कि क़ब्रें होनी मगर आस्ताँ नहीं होना मक़ाम-ए-शुक्र है मेरे लिए कि मेरे मुरीद ये तेरा आज मिरा क़द्र-दाँ नहीं होना मैं ख़ानदान का सब से बड़ा मदारी हूँ तमाशा होता रहेगा यहाँ नहीं होना बस इतनी दूरी मुयस्सर रहेगी दोनों को कि फ़ासला भी कोई दरमियाँ नहीं होना अजब अज़ाब था कि अपने शहर-ए-अरमाँ में हमारे वास्ते जा-ए-अमाँ नहीं होना ये ज़ुल्म है कि मुनादी हो इम्तिहानों की फिर इस के ब'अद कोई इम्तिहाँ नहीं होना अजब सुपुर्दगी-ए-जाँ का मरहला था 'अली' हमारे होने का हम को गुमाँ नहीं होना

Liaqat Jafri

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अजीब लोग थे वो तितलियाँ बनाते थे समुंदरों के लिए सीपियाँ बनाते थे वही बनाते थे लोहे को तोड़ कर ताला फिर उस के बा'द वही चाबियाँ बनाते थे मेरे क़बीले में ता'लीम का रिवाज न था मिरे बुज़ुर्ग मगर तख़्तियाँ बनाते थे फ़ुज़ूल वक़्त में वो सारे शीशागर मिल कर सुहागनों के लिए चूड़ियाँ बनाते थे

Liaqat Jafri

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पड़े पड़े नई ज़र-ख़ेज़ियाँ निकल आईं कटे दरख़्त में फिर टहनियाँ निकल आईं उस आइने में था सरसब्ज़ बाग़ का मंज़र छुआ जो मैं ने तो दो तितलियाँ निकल आईं मैं तोड़ डाला गया तो इमारत-ए-जाँ में कहाँ कहाँ से मिरी चाबियाँ निकल आईं मैं आसमान पे पहुँचा तो लड़खड़ाने लगा बुलंदियों में अजब पस्तियाँ निकल आईं ठहर गए तो मुयस्सर हुई न जा-ए-अमाँ जो चल पड़े तो कई बस्तियाँ निकल आईं वही नसीब कि मैं शहरयार जिस से बना उसी नसीब में तंग-दस्तियाँ निकल आईं मिरे इलाज को अल्लाह इस्तक़ामत दे मिरे मरीज़ की फिर पस्लियाँ निकल आईं मैं आसमान से उतरा ज़मीन की जानिब ज़मीं से मेरी तरफ़ सीढ़ियाँ निकल आईं वही सूराख़ जहाँ छिपकिली का डेरा था उसी सूराख़ से फिर च्यूँँंटियाँ निकल आईं अभी अभी तो सँभाला गया था गर्द-ओ-ग़ुबार हिसार-ए-दश्त में फिर आँधियाँ निकल आईं सँभाल रखा था अम्मी ने जिस को मौत तलक उसी कबाड़ से कुछ तख़्तियाँ निकल आईं मैं आख़िरी था जिसे सरफ़राज़ होना था मिरे हुनर में भी कोताहियाँ निकल आईं

Liaqat Jafri

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सर पे सजने को जो तय्यार है मेरे अंदर गर्द-आलूद सी दस्तार है मेरे अंदर जिस के मर जाने का एहसास बना रहता है मुझ से बढ़ कर कोई बीमार है मेरे अंदर रोज़ अश्कों की नई फ़स्ल उगा देता है एक बूढ़ा सा ज़मींदार है मेरे अंदर कितना घनघोर अँधेरा है मिरी रग रग में इस क़दर रौशनी दरकार है मेरे अंदर दब के मर जाऊँगा इक रोज़ मैं अपने नीचे एक गिरती हुई दीवार है मेरे अंदर कौन देता है ये हर वक़्त गवाही मेरी कौन ये मेरा तरफ़-दार है मेरे अंदर मेरे लिक्खे हुए हर लफ़्ज़ को झुटलाता है मुझ से बढ़ कर कोई फ़नकार है मेरे अंदर

Liaqat Jafri

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अजीब लोग थे वो तितलियाँ बनाते थे समुंदरों के लिए सीपियाँ बनाते थे वही बनाते थे लोहे को तोड़ कर ताला फिर उस के बा'द वही चाबियाँ बनाते थे मेरे क़बीले में ता'लीम का रिवाज न था मिरे बुज़ुर्ग मगर तख़्तियाँ बनाते थे फ़ुज़ूल वक़्त में वो सारे शीशागर मिल कर सुहागनों के लिए चूड़ियाँ बनाते थे

Liaqat Jafri

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