ghazalKuch Alfaaz

मिरे वजूद अभी ना-तवाँ नहीं होना फिर इस के ब'अद ये मौसम जवाँ नहीं होना किसे ख़बर थी कि महशर का होगा ये भी रंग ज़मीं का होना मगर आसमाँ नहीं होना हमें ख़बर है कि वहशत ठिकाने लगनी है हमारा जोश अभी राएगाँ नहीं होना वजूद अपना है और आप तय करेंगे हम कहाँ पे होना है हम को कहाँ नहीं होना अब इस के ब'अद सकत कुछ नहीं रही मुझ में अब इस से आगे का क़िस्सा बयाँ नहीं होना हमारी बस्ती का दुख है हमीं से पूछो मियाँ कि क़ब्रें होनी मगर आस्ताँ नहीं होना मक़ाम-ए-शुक्र है मेरे लिए कि मेरे मुरीद ये तेरा आज मिरा क़द्र-दाँ नहीं होना मैं ख़ानदान का सब से बड़ा मदारी हूँ तमाशा होता रहेगा यहाँ नहीं होना बस इतनी दूरी मुयस्सर रहेगी दोनों को कि फ़ासला भी कोई दरमियाँ नहीं होना अजब अज़ाब था कि अपने शहर-ए-अरमाँ में हमारे वास्ते जा-ए-अमाँ नहीं होना ये ज़ुल्म है कि मुनादी हो इम्तिहानों की फिर इस के ब'अद कोई इम्तिहाँ नहीं होना अजब सुपुर्दगी-ए-जाँ का मरहला था 'अली' हमारे होने का हम को गुमाँ नहीं होना

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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अजीब लोग थे वो तितलियाँ बनाते थे समुंदरों के लिए सीपियाँ बनाते थे वही बनाते थे लोहे को तोड़ कर ताला फिर उस के बा'द वही चाबियाँ बनाते थे मेरे क़बीले में ता'लीम का रिवाज न था मिरे बुज़ुर्ग मगर तख़्तियाँ बनाते थे फ़ुज़ूल वक़्त में वो सारे शीशागर मिल कर सुहागनों के लिए चूड़ियाँ बनाते थे

Liaqat Jafri

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ये जो रह रह के सर-ए-दश्त हवा चलती है कितनी अच्छी है मगर कितना बुरा चलती है एक आसेब तआक़ुब में लगा रहता है मैं जो रुकता हूँ तो फिर उस की सदा चलती है हाए वो साँस कि रुकती है तो क्या रुकती है हाए वो आँख कि चलती है तो क्या चलती है पेश-ख़ेमा है किसी और नई वहशत का ये जो इतरा के अभी बाद-ए-सबा चलती है तीर चलते हैं लगातार सवाद-ए-जाँ में और तलवार कोई एक जुदा चलती है बीच दरिया के अजब जश्न बपा है यारो साथ कश्ती के कोई मौज-ए-बला चलती है आज कुछ और ही मंज़र है मिरे चारों तरफ़ ग़ैर-महसूस तरीक़े से हवा चलती है मैं ब-ज़ाहिर तो हूँ आसूदा प मेरे अंदर धी में धी में से कहीं आह-ओ-बुका चलती है यूँँ तो बेबाक बना फिरता है वो यारों में उस की आँखों में अजब शर्म-ओ-हया चलती है मेरे मौला जो रहे सिर्फ़ कहा तेरा रहे मेरे होंटों पे यही एक दुआ चलती है

Liaqat Jafri

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मुस्लिम हूँ पर ख़ुद पे क़ाबू रहता है मेरे अंदर भी इक हिन्दू रहता है कोई जादूगर के बाज़ू काट भी दे उस के हाथ में फिर भी जादू रहता है रात गए तक बच्चे दौड़ते रहते हैं मेरे कमरे में इक जुगनू रहता है 'मीर' का दिवाना 'ग़ालिब' का शैदाई मेरी बस्ती में इक साधू रहता है उस के लबों पर इंग्लिश विंग्लिश रहती है मेरे होंट पे उर्दू उर्दू रहता है अक़्ल हज़ारों भेस बदलती रहती है ये दिल मर जाने तक बुद्धू रहता है

Liaqat Jafri

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पड़े पड़े नई ज़र-ख़ेज़ियाँ निकल आईं कटे दरख़्त में फिर टहनियाँ निकल आईं उस आइने में था सरसब्ज़ बाग़ का मंज़र छुआ जो मैं ने तो दो तितलियाँ निकल आईं मैं तोड़ डाला गया तो इमारत-ए-जाँ में कहाँ कहाँ से मिरी चाबियाँ निकल आईं मैं आसमान पे पहुँचा तो लड़खड़ाने लगा बुलंदियों में अजब पस्तियाँ निकल आईं ठहर गए तो मुयस्सर हुई न जा-ए-अमाँ जो चल पड़े तो कई बस्तियाँ निकल आईं वही नसीब कि मैं शहरयार जिस से बना उसी नसीब में तंग-दस्तियाँ निकल आईं मिरे इलाज को अल्लाह इस्तक़ामत दे मिरे मरीज़ की फिर पस्लियाँ निकल आईं मैं आसमान से उतरा ज़मीन की जानिब ज़मीं से मेरी तरफ़ सीढ़ियाँ निकल आईं वही सूराख़ जहाँ छिपकिली का डेरा था उसी सूराख़ से फिर च्यूँँंटियाँ निकल आईं अभी अभी तो सँभाला गया था गर्द-ओ-ग़ुबार हिसार-ए-दश्त में फिर आँधियाँ निकल आईं सँभाल रखा था अम्मी ने जिस को मौत तलक उसी कबाड़ से कुछ तख़्तियाँ निकल आईं मैं आख़िरी था जिसे सरफ़राज़ होना था मिरे हुनर में भी कोताहियाँ निकल आईं

Liaqat Jafri

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सर पे सजने को जो तय्यार है मेरे अंदर गर्द-आलूद सी दस्तार है मेरे अंदर जिस के मर जाने का एहसास बना रहता है मुझ से बढ़ कर कोई बीमार है मेरे अंदर रोज़ अश्कों की नई फ़स्ल उगा देता है एक बूढ़ा सा ज़मींदार है मेरे अंदर कितना घनघोर अँधेरा है मिरी रग रग में इस क़दर रौशनी दरकार है मेरे अंदर दब के मर जाऊँगा इक रोज़ मैं अपने नीचे एक गिरती हुई दीवार है मेरे अंदर कौन देता है ये हर वक़्त गवाही मेरी कौन ये मेरा तरफ़-दार है मेरे अंदर मेरे लिक्खे हुए हर लफ़्ज़ को झुटलाता है मुझ से बढ़ कर कोई फ़नकार है मेरे अंदर

Liaqat Jafri

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