पहले इक शख़्स मेरी ज़ात बना और फिर पूरी काएनात बना हुस्न ने ख़ुद कहा मुसव्विर से पाँव पर मेरे कोई हाथ बना प्यास की सल्तनत नहीं मिटती लाख दजले बना फ़ुरात बना ग़म का सूरज वो दे गया तुझ को चाहे अब दिन बना कि रात बना शे'र इक मश्ग़ला था 'क़ासिर' का अब यही मक़्सद-ए-हयात बना
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
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बन में वीराँ थी नज़र शहर में दिल रोता है ज़िंदगी से ये मिरा दूसरा समझौता है लहलहाते हुए ख़्वाबों से मिरी आँखों तक रतजगे काश्त न कर ले तो वो कब सोता है जिस को इस फ़स्ल में होना है बराबर का शरीक मेरे एहसास में तन्हाइयाँ क्यूँँ बोता है नाम लिख लिख के तिरा फूल बनाने वाला आज फिर शबनमीं आँखों से वरक़ धोता है तेरे बख़्शे हुए इक ग़म का करिश्मा है कि अब जो भी ग़म हो मिरे मेआ'र से कम होता है सो गए शहर-ए-मोहब्बत के सभी दाग़ ओ चराग़ एक साया पस-ए-दीवार अभी रोता है ये भी इक रंग है शायद मिरी महरूमी का कोई हँस दे तो मोहब्बत का गुमाँ होता है
Ghulam Mohammad Qasir
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अकेला दिन है कोई और न तन्हा रात होती है मैं जिस पल से गुज़रता हूँ मोहब्बत साथ होती है तिरी आवाज़ को इस शहर की लहरें तरसती हैं ग़लत नंबर मिलाता हूँ तो पहरों बात होती है सरों पर ख़ौफ़-ए-रुस्वाई की चादर तान लेते हो तुम्हारे वास्ते रंगों की जब बरसात होती है कहीं चिड़ियाँ चहकती हैं कहीं कलियाँ चटकती हैं मगर मेरे मकाँ से आसमाँ तक रात होती है किसे आबाद समझूँ किस का शहर-आशोब लिखूँ मैं जहाँ शहरों की यकसाँ सूरत-ए-हालात होती है
Ghulam Mohammad Qasir
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नज़र नज़र में अदा-ए-जमाल रखते थे हम एक शख़्स का कितना ख़याल रखते थे जबीं पे आने न देते थे इक शिकन भी कभी अगरचे दिल में हज़ारों मलाल रखते थे ख़ुशी उसी की हमेशा नज़र में रहती थी और अपनी क़ुव्वत-ए-ग़म भी बहाल रखते थे बस इश्तियाक़-ए-तकल्लुम में बार-हा हम लोग जवाब दिल में ज़बाँ पर सवाल रखते थे उसी से करते थे हम रोज़ ओ शब का अंदाज़ा ज़मीं पे रह के वो सूरज की चाल रखते थे जुनूँ का जाम मोहब्बत की मय ख़िरद का ख़ुमार हमीं थे वो जो ये सारे कमाल रखते थे छुपा के अपनी सिसकती सुलगती सोचों से मोहब्बतों के उरूज ओ ज़वाल रखते थे कुछ उन का हुस्न भी था मावरा मिसालों से कुछ अपना इश्क़ भी हम बे-मिसाल रखते थे ख़ता नहीं जो खिले फूल राह-ए-सरसर में ये जुर्म है कि वो फ़िक्र-ए-मआल रखते थे
Ghulam Mohammad Qasir
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कश्ती भी नहीं बदली दरिया भी नहीं बदला और डूबने वालों का जज़्बा भी नहीं बदला तस्वीर नहीं बदली शीशा भी नहीं बदला नज़रें भी सलामत हैं चेहरा भी नहीं बदला है शौक़-ए-सफ़र ऐसा इक उम्र से यारों ने मंज़िल भी नहीं पाई रस्ता भी नहीं बदला बेकार गया बन में सोना मिरा सदियों का इस शहर में तो अब तक सिक्का भी नहीं बदला बे-सम्त हवाओं ने हर लहर से साज़िश की ख़्वाबों के जज़ीरे का नक़्शा भी नहीं बदला
Ghulam Mohammad Qasir
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बग़ैर उस के अब आराम भी नहीं आता वो शख़्स जिस का मुझे नाम भी नहीं आता उसी की शक्ल मुझे चाँद में नज़र आए वो माह-रुख़ जो लब-ए-बाम भी नहीं आता करूँँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता बिठा दिया मुझे दरिया के उस किनारे पर जिधर हुबाब तही-जाम भी नहीं आता चुरा के ख़्वाब वो आँखों को रेहन रखता है और उस के सर कोई इल्ज़ाम भी नहीं आता
Ghulam Mohammad Qasir
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