बन में वीराँ थी नज़र शहर में दिल रोता है ज़िंदगी से ये मिरा दूसरा समझौता है लहलहाते हुए ख़्वाबों से मिरी आँखों तक रतजगे काश्त न कर ले तो वो कब सोता है जिस को इस फ़स्ल में होना है बराबर का शरीक मेरे एहसास में तन्हाइयाँ क्यूँँ बोता है नाम लिख लिख के तिरा फूल बनाने वाला आज फिर शबनमीं आँखों से वरक़ धोता है तेरे बख़्शे हुए इक ग़म का करिश्मा है कि अब जो भी ग़म हो मिरे मेआ'र से कम होता है सो गए शहर-ए-मोहब्बत के सभी दाग़ ओ चराग़ एक साया पस-ए-दीवार अभी रोता है ये भी इक रंग है शायद मिरी महरूमी का कोई हँस दे तो मोहब्बत का गुमाँ होता है
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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अकेला दिन है कोई और न तन्हा रात होती है मैं जिस पल से गुज़रता हूँ मोहब्बत साथ होती है तिरी आवाज़ को इस शहर की लहरें तरसती हैं ग़लत नंबर मिलाता हूँ तो पहरों बात होती है सरों पर ख़ौफ़-ए-रुस्वाई की चादर तान लेते हो तुम्हारे वास्ते रंगों की जब बरसात होती है कहीं चिड़ियाँ चहकती हैं कहीं कलियाँ चटकती हैं मगर मेरे मकाँ से आसमाँ तक रात होती है किसे आबाद समझूँ किस का शहर-आशोब लिखूँ मैं जहाँ शहरों की यकसाँ सूरत-ए-हालात होती है
Ghulam Mohammad Qasir
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नज़र नज़र में अदा-ए-जमाल रखते थे हम एक शख़्स का कितना ख़याल रखते थे जबीं पे आने न देते थे इक शिकन भी कभी अगरचे दिल में हज़ारों मलाल रखते थे ख़ुशी उसी की हमेशा नज़र में रहती थी और अपनी क़ुव्वत-ए-ग़म भी बहाल रखते थे बस इश्तियाक़-ए-तकल्लुम में बार-हा हम लोग जवाब दिल में ज़बाँ पर सवाल रखते थे उसी से करते थे हम रोज़ ओ शब का अंदाज़ा ज़मीं पे रह के वो सूरज की चाल रखते थे जुनूँ का जाम मोहब्बत की मय ख़िरद का ख़ुमार हमीं थे वो जो ये सारे कमाल रखते थे छुपा के अपनी सिसकती सुलगती सोचों से मोहब्बतों के उरूज ओ ज़वाल रखते थे कुछ उन का हुस्न भी था मावरा मिसालों से कुछ अपना इश्क़ भी हम बे-मिसाल रखते थे ख़ता नहीं जो खिले फूल राह-ए-सरसर में ये जुर्म है कि वो फ़िक्र-ए-मआल रखते थे
Ghulam Mohammad Qasir
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पहले इक शख़्स मेरी ज़ात बना और फिर पूरी काएनात बना हुस्न ने ख़ुद कहा मुसव्विर से पाँव पर मेरे कोई हाथ बना प्यास की सल्तनत नहीं मिटती लाख दजले बना फ़ुरात बना ग़म का सूरज वो दे गया तुझ को चाहे अब दिन बना कि रात बना शे'र इक मश्ग़ला था 'क़ासिर' का अब यही मक़्सद-ए-हयात बना
Ghulam Mohammad Qasir
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कहीं लोग तन्हा कहीं घर अकेले कहाँ तक मैं देखूँ ये मंज़र अकेले गली में हवाओं की सरगोशियाँ हैं घरों में मगर सब सनोबर अकेले नुमाइश हज़ारों निगाहों ने देखी मगर फूल पहले से बढ़ कर अकेले अब इक तीर भी हो लिया साथ वर्ना परिंदा चला था सफ़र पर अकेले जो देखो तो इक लहर में जा रहे हैं जो सोचो तो सारे शनावर अकेले तिरी याद की बर्फ़-बारी का मौसम सुलगता रहा दिल के अंदर अकेले इरादा था जी लूँगा तुझ से बिछड़ कर गुज़रता नहीं इक दिसम्बर अकेले ज़माने से 'क़ासिर' ख़फ़ा तो नहीं हैं कि देखे गए हैं वो अक्सर अकेले
Ghulam Mohammad Qasir
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बग़ैर उस के अब आराम भी नहीं आता वो शख़्स जिस का मुझे नाम भी नहीं आता उसी की शक्ल मुझे चाँद में नज़र आए वो माह-रुख़ जो लब-ए-बाम भी नहीं आता करूँँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता बिठा दिया मुझे दरिया के उस किनारे पर जिधर हुबाब तही-जाम भी नहीं आता चुरा के ख़्वाब वो आँखों को रेहन रखता है और उस के सर कोई इल्ज़ाम भी नहीं आता
Ghulam Mohammad Qasir
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