ghazalKuch Alfaaz

कहीं लोग तन्हा कहीं घर अकेले कहाँ तक मैं देखूँ ये मंज़र अकेले गली में हवाओं की सरगोशियाँ हैं घरों में मगर सब सनोबर अकेले नुमाइश हज़ारों निगाहों ने देखी मगर फूल पहले से बढ़ कर अकेले अब इक तीर भी हो लिया साथ वर्ना परिंदा चला था सफ़र पर अकेले जो देखो तो इक लहर में जा रहे हैं जो सोचो तो सारे शनावर अकेले तिरी याद की बर्फ़-बारी का मौसम सुलगता रहा दिल के अंदर अकेले इरादा था जी लूँगा तुझ से बिछड़ कर गुज़रता नहीं इक दिसम्बर अकेले ज़माने से 'क़ासिर' ख़फ़ा तो नहीं हैं कि देखे गए हैं वो अक्सर अकेले

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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अकेला दिन है कोई और न तन्हा रात होती है मैं जिस पल से गुज़रता हूँ मोहब्बत साथ होती है तिरी आवाज़ को इस शहर की लहरें तरसती हैं ग़लत नंबर मिलाता हूँ तो पहरों बात होती है सरों पर ख़ौफ़-ए-रुस्वाई की चादर तान लेते हो तुम्हारे वास्ते रंगों की जब बरसात होती है कहीं चिड़ियाँ चहकती हैं कहीं कलियाँ चटकती हैं मगर मेरे मकाँ से आसमाँ तक रात होती है किसे आबाद समझूँ किस का शहर-आशोब लिखूँ मैं जहाँ शहरों की यकसाँ सूरत-ए-हालात होती है

Ghulam Mohammad Qasir

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बन में वीराँ थी नज़र शहर में दिल रोता है ज़िंदगी से ये मिरा दूसरा समझौता है लहलहाते हुए ख़्वाबों से मिरी आँखों तक रतजगे काश्त न कर ले तो वो कब सोता है जिस को इस फ़स्ल में होना है बराबर का शरीक मेरे एहसास में तन्हाइयाँ क्यूँँ बोता है नाम लिख लिख के तिरा फूल बनाने वाला आज फिर शबनमीं आँखों से वरक़ धोता है तेरे बख़्शे हुए इक ग़म का करिश्मा है कि अब जो भी ग़म हो मिरे मेआ'र से कम होता है सो गए शहर-ए-मोहब्बत के सभी दाग़ ओ चराग़ एक साया पस-ए-दीवार अभी रोता है ये भी इक रंग है शायद मिरी महरूमी का कोई हँस दे तो मोहब्बत का गुमाँ होता है

Ghulam Mohammad Qasir

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नज़र नज़र में अदा-ए-जमाल रखते थे हम एक शख़्स का कितना ख़याल रखते थे जबीं पे आने न देते थे इक शिकन भी कभी अगरचे दिल में हज़ारों मलाल रखते थे ख़ुशी उसी की हमेशा नज़र में रहती थी और अपनी क़ुव्वत-ए-ग़म भी बहाल रखते थे बस इश्तियाक़-ए-तकल्लुम में बार-हा हम लोग जवाब दिल में ज़बाँ पर सवाल रखते थे उसी से करते थे हम रोज़ ओ शब का अंदाज़ा ज़मीं पे रह के वो सूरज की चाल रखते थे जुनूँ का जाम मोहब्बत की मय ख़िरद का ख़ुमार हमीं थे वो जो ये सारे कमाल रखते थे छुपा के अपनी सिसकती सुलगती सोचों से मोहब्बतों के उरूज ओ ज़वाल रखते थे कुछ उन का हुस्न भी था मावरा मिसालों से कुछ अपना इश्क़ भी हम बे-मिसाल रखते थे ख़ता नहीं जो खिले फूल राह-ए-सरसर में ये जुर्म है कि वो फ़िक्र-ए-मआल रखते थे

Ghulam Mohammad Qasir

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पहले इक शख़्स मेरी ज़ात बना और फिर पूरी काएनात बना हुस्न ने ख़ुद कहा मुसव्विर से पाँव पर मेरे कोई हाथ बना प्यास की सल्तनत नहीं मिटती लाख दजले बना फ़ुरात बना ग़म का सूरज वो दे गया तुझ को चाहे अब दिन बना कि रात बना शे'र इक मश्ग़ला था 'क़ासिर' का अब यही मक़्सद-ए-हयात बना

Ghulam Mohammad Qasir

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बग़ैर उस के अब आराम भी नहीं आता वो शख़्स जिस का मुझे नाम भी नहीं आता उसी की शक्ल मुझे चाँद में नज़र आए वो माह-रुख़ जो लब-ए-बाम भी नहीं आता करूँँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता बिठा दिया मुझे दरिया के उस किनारे पर जिधर हुबाब तही-जाम भी नहीं आता चुरा के ख़्वाब वो आँखों को रेहन रखता है और उस के सर कोई इल्ज़ाम भी नहीं आता

Ghulam Mohammad Qasir

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