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raah ko jo asan bana de vo manzil kya manzil hai har manzil se aage yaaro apne shauq ka hasil hai jis ko dard ka darman samjha vo bhi dard bhara dil hai itne dard pe bhi ye duniya kitne pyaar ke qabil hai bahar se avaz ye aae tum hi masiha ho apne mere andar shor bapa ho dil hi apna qatil hai kuchh manzil par ja sustae kuchh rahon men baith gae koi kisi ka bhed na jaane apni apni manzil hai ham ko insan aur khuda ke farq pe kitni vahshat thi dekha to is dorahe par apni zaat hi haael hai na-danon ko de deti hai duniya farzanon ka naam vo hi divana kahlae jo bhi 'ishq men kamil hai rang-e-mohabbat rang-e-abad hai phuul huun main mahkar hai tu daaim qaaem raunaq-e-hasti teri meri mahfil hai tufanon se dar jaaen to sahil se tufan umden maujon ko patvar bana len to har mauj hi sahil hai mushkil ko asan samajh ke ham har 'uqda kholenge apni fikr 'jamil' karen vo sahl bhi jin ko mushkil hai rah ko jo aasan bana de wo manzil kya manzil hai har manzil se aage yaro apne shauq ka hasil hai jis ko dard ka darman samjha wo bhi dard bhara dil hai itne dard pe bhi ye duniya kitne pyar ke qabil hai bahar se aawaz ye aae tum hi masiha ho apne mere andar shor bapa ho dil hi apna qatil hai kuchh manzil par ja sustae kuchh rahon mein baith gae koi kisi ka bhed na jaane apni apni manzil hai hum ko insan aur khuda ke farq pe kitni wahshat thi dekha to is dorahe par apni zat hi hael hai na-danon ko de deti hai duniya farzanon ka nam wo hi diwana kahlae jo bhi 'ishq mein kaamil hai rang-e-mohabbat rang-e-abad hai phul hun main mahkar hai tu daim qaem raunaq-e-hasti teri meri mahfil hai tufanon se dar jaen to sahil se tufan umden maujon ko patwar bana len to har mauj hi sahil hai mushkil ko aasan samajh ke hum har 'uqda kholenge apni fikr 'jamil' karen wo sahl bhi jin ko mushkil hai

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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महफ़िलें ख़्वाब हुईं रह गए तन्हा चेहरे वक़्त ने छीन लिए कितने शनासा चेहरे सारी दुनिया के लिए एक तमाशा चेहरे दिल तो पर्दे में रहे हो गए रुस्वा चेहरे तुम वो बे-दर्द कि मुड़ कर भी न देखा उन को वर्ना करते रहे क्या क्या न तक़ाज़ा चेहरे कितने हाथों ने तराशे ये हसीं ताज-महल झाँकते हैं दर-ओ-दीवार से क्या क्या चेहरे सोए पत्तों की तरह जागती कलियों की तरह ख़ाक में गुम तो कभी ख़ाक से पैदा चेहरे ख़ुद ही वीरानी-ए-दिल ख़ुद ही चराग़-ए-महफ़िल कभी महरूम-ए-तमन्ना कभी शैदा चेहरे ख़ाक उड़ती भी रही अब्र बरसता भी रहा हम ने देखे कभी सहरा कभी दरिया-चेहरे यही इमरोज़ भी हंगामा-ए-फ़र्दा भी यही पेश करते रहे हर दौर का नक़्शा चेहरे दीप जलते ही रहे ताक़ पे अरमानों के कितनी सदियों से है हर घर का उजाला चेहरे ख़त्म हो जाएँ जिन्हें देख के बीमारी-ए-दिल ढूँढ़ कर लाएँ कहाँ से वो मसीहा चेहरे दास्ताँ ख़त्म न होगी कभी चेहरों की 'जमील' हुस्न-ए-यूसुफ़ तो कभी इश्क़-ए-ज़ुलेख़ा चेहरे

Jameel Malik

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