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rudad-e-mohabbat kya kahiye kuchh yaad rahi kuchh bhuul gae do din ki masarrat kya kahiye kuchh yaad rahi kuchh bhuul gae jab jaam diya tha saaqi ne jab daur chala tha mahfil men ik hosh ki saaat kya kahiye kuchh yaad rahi kuchh bhuul gae ab vaqt ke nazuk honton par majruh tarannum raqsan hai bedad-e-mashiyyat kya kahiye kuchh yaad rahi kuchh bhuul gae ehsas ke mai-khane men kahan ab fikr-o-nazar ki qindilen alam ki shiddat kya kahiye kuchh yaad rahi kuchh bhuul gae kuchh haal ke andhe sathi the kuchh maazi ke ayyar sajan ahbab ki chahat kya kahiye kuchh yaad rahi kuchh bhuul gae kanton se bhara hai daman-e-dil shabnam se sulagti hain palken phulon ki sakhavat kya kahiye kuchh yaad rahi kuchh bhuul gae ab apni haqiqat bhi 'saghhar' be-rabt kahani lagti hai duniya ki haqiqat kya kahiye kuchh yaad rahi kuchh bhuul gae rudad-e-mohabbat kya kahiye kuchh yaad rahi kuchh bhul gae do din ki masarrat kya kahiye kuchh yaad rahi kuchh bhul gae jab jam diya tha saqi ne jab daur chala tha mahfil mein ek hosh ki saat kya kahiye kuchh yaad rahi kuchh bhul gae ab waqt ke nazuk honton par majruh tarannum raqsan hai bedad-e-mashiyyat kya kahiye kuchh yaad rahi kuchh bhul gae ehsas ke mai-khane mein kahan ab fikr-o-nazar ki qindilen aalam ki shiddat kya kahiye kuchh yaad rahi kuchh bhul gae kuchh haal ke andhe sathi the kuchh mazi ke ayyar sajan ahbab ki chahat kya kahiye kuchh yaad rahi kuchh bhul gae kanton se bhara hai daman-e-dil shabnam se sulagti hain palken phulon ki sakhawat kya kahiye kuchh yaad rahi kuchh bhul gae ab apni haqiqat bhi 'saghar' be-rabt kahani lagti hai duniya ki haqiqat kya kahiye kuchh yaad rahi kuchh bhul gae

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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याद तब करते हो करने को न हो जब कुछ भी और कहते हो तुम्हें इश्क़ है मतलब कुछ भी अब जो आ आ के बताते हो वो शख़्स ऐसा था जब मेरे साथ था वो क्यूँँ न कहा तब कुछ भी वक्फ़े-वक्फ़े से मुझे देखने आते रहना हिज्र की शब है सो हो सकता है इस शब कुछ भी

Umair Najmi

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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मैं तल्ख़ी-ए-हयात से घबरा के पी गया ग़म की सियाह रात से घबरा के पी गया इतनी दक़ीक़ शय कोई कैसे समझ सके यज़्दाँ के वाक़िआत से घबरा के पी गया छलके हुए थे जाम परेशाँ थी ज़ुल्फ़-ए-यार कुछ ऐसे हादसात से घबरा के पी गया मैं आदमी हूँ कोई फ़रिश्ता नहीं हुज़ूर मैं आज अपनी ज़ात से घबरा के पी गया दुनिया-ए-हादसात है इक दर्दनाक गीत दुनिया-ए-हादसात से घबरा के पी गया काँटे तो ख़ैर काँटे हैं इस का गिला ही क्या फूलों की वारदात से घबरा के पी गया 'साग़र' वो कह रहे थे कि पी लीजिए हुज़ूर उन की गुज़ारिशात से घबरा के पी गया

Saghar Siddiqui

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ऐ दिल-ए-बे-क़रार चुप हो जा जा चुकी है बहार चुप हो जा अब न आएँगे रूठने वाले दीदा-ए-अश्क-बार चुप हो जा जा चुका कारवान-लाला-ओ-गुल उड़ रहा है ग़ुबार चुप हो जा छूट जाती है फूल से ख़ुश्बू रूठ जाते हैं यार चुप हो जा हम फ़क़ीरों का इस ज़माने में कौन है ग़म-गुसार चुप हो जा हादसों की न आँख खुल जाए हसरत-ए-सोगवार चुप हो जा गीत की ज़र्ब से भी ऐ 'साग़र' टूट जाते हैं तार चुप हो जा

Saghar Siddiqui

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