ghazalKuch Alfaaz

ऐ दिल-ए-बे-क़रार चुप हो जा जा चुकी है बहार चुप हो जा अब न आएँगे रूठने वाले दीदा-ए-अश्क-बार चुप हो जा जा चुका कारवान-लाला-ओ-गुल उड़ रहा है ग़ुबार चुप हो जा छूट जाती है फूल से ख़ुश्बू रूठ जाते हैं यार चुप हो जा हम फ़क़ीरों का इस ज़माने में कौन है ग़म-गुसार चुप हो जा हादसों की न आँख खुल जाए हसरत-ए-सोगवार चुप हो जा गीत की ज़र्ब से भी ऐ 'साग़र' टूट जाते हैं तार चुप हो जा

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तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया

Tehzeeb Hafi

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ये रहमत हो जाए हमपर अगले साल काश चले जाएँ अपने घर अगले साल हाथ नजूमी ने देखा और ये बोला आप सफल हो जाएँगे, पर अगले साल बारह मास दिया है जितना दुख तुम ने उतनी ख़ुशियाँ बरसे तुमपर अगले साल फ़ोन जनम-दिन पर ही शायद वो कर दे जल्दी आए यार सितम्बर अगले साल हम जैसों का बचपन ये कह कर गुज़रा ले आएँगे अच्छे नंबर अगले साल

Tanoj Dadhich

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कोई उम्मीद बर नहीं आती कोई सूरत नज़र नहीं आती मौत का एक दिन मुअय्यन है नींद क्यूँँ रात भर नहीं आती आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी अब किसी बात पर नहीं आती जानता हूँ सवाब-ए-ताअत-ओ-ज़ोहद पर तबीअत इधर नहीं आती है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ वर्ना क्या बात कर नहीं आती क्यूँँ न चीख़ूँ कि याद करते हैं मेरी आवाज़ गर नहीं आती दाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आता बू भी ऐ चारा-गर नहीं आती हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी कुछ हमारी ख़बर नहीं आती मरते हैं आरज़ू में मरने की मौत आती है पर नहीं आती का'बा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब' शर्म तुम को मगर नहीं आती

Mirza Ghalib

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उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या दाग़ ही देंगे मुझ को दान में क्या मेरी हर बात बे-असर ही रही नक़्स है कुछ मिरे बयान में क्या मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं यही होता है ख़ानदान में क्या अपनी महरूमियाँ छुपाते हैं हम ग़रीबों की आन-बान में क्या ख़ुद को जाना जुदा ज़माने से आ गया था मिरे गुमान में क्या शाम ही से दुकान-ए-दीद है बंद नहीं नुक़सान तक दुकान में क्या ऐ मिरे सुब्ह-ओ-शाम-ए-दिल की शफ़क़ तू नहाती है अब भी बान में क्या बोलते क्यूँँ नहीं मिरे हक़ में आबले पड़ गए ज़बान में क्या ख़ामुशी कह रही है कान में क्या आ रहा है मिरे गुमान में क्या दिल कि आते हैं जिस को ध्यान बहुत ख़ुद भी आता है अपने ध्यान में क्या वो मिले तो ये पूछना है मुझे अब भी हूँ मैं तिरी अमान में क्या यूँँ जो तकता है आसमान को तू कोई रहता है आसमान में क्या है नसीम-ए-बहार गर्द-आलूद ख़ाक उड़ती है उस मकान में क्या ये मुझे चैन क्यूँँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या

Jaun Elia

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रब्त है मुझ से तिरा तो रब्त का उनवान बोल या मुझे अंजान कह दे या फिर अपनी जान बोल एक ही चेहरा नज़र में और लबों पे इक ही नाम और क्या होती है सच्चे इश्क़ की पहचान बोल ? मैं अँगूठी बेच कर ले आया तेरी बालियाँ सूने-सूने देखता कब तक मैं तेरे कान बोल ये मुलायम हाथ मेरे काम कब आएँगे जाँ? कब बिछेगा इन से मेरे घर में दस्तर-ख़्वान बोल ? कब मिलेगी सुब्ह तुझ से चाय की प्याली मुझे? कब तेरे हाथों का खाऊँगा कोई पकवान बोल ? कब तिरे वालिद मिरे वालिद से मिलने आएँगे? कब तिरी अम्मी को बोलूँगा मैं अम्मी जान बोल? पूछते है सब तिरा मैं कौन हूँ क्या नाम है बोलने का वक़्त है अब, बोल मेरी जान बोल

Varun Anand

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