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ये रहमत हो जाए हमपर अगले साल काश चले जाएँ अपने घर अगले साल हाथ नजूमी ने देखा और ये बोला आप सफल हो जाएँगे, पर अगले साल बारह मास दिया है जितना दुख तुम ने उतनी ख़ुशियाँ बरसे तुमपर अगले साल फ़ोन जनम-दिन पर ही शायद वो कर दे जल्दी आए यार सितम्बर अगले साल हम जैसों का बचपन ये कह कर गुज़रा ले आएँगे अच्छे नंबर अगले साल

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना

Zubair Ali Tabish

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इस से पहले कि तुझे और सहारा न मिले मैं तिरे साथ हूँ जब तक मिरे जैसा न मिले कम से कम बदले में जन्नत उसे दे दी जाए जिस मोहब्बत के गिरफ्तार को सेहरा ना मिले लोग कहते है के हम लोग बुरे आदमी है लोग भी ऐसे जिन्होने हमें देखा ना मिले बस यही कह के उसे मैं ने ख़ुदा को सौंपा इत्तिफ़ाक़न कही मिल जाए तो रोता ना मिले बद-दुआ है के वहाँ आए जहाँ बैठते थे और ‘अफ्कार’ वहाँ आप को बैठा ना मिले

Afkar Alvi

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चमचमाती कार में उस की बिदाई हो गई पर यक़ीन आता नहीं है बेवफ़ाई हो गई पार्क में सब दोस्त मेरे राह देखें हैं मेरी अब तो जाने दो मुझे अब तो पढ़ाई हो गई आदमी को और बच्चों को पता चलता नहीं रोटी सब्ज़ी कब बनी और कब सफ़ाई हो गई आओ बैठो अब सुनो तारीफ़ मेरी दोस्तों जिस ने छोड़ा है मुझे उस की बुराई हो गई आख़री चोटी से गिरकर हम मरे हैं इश्क़ की हम समझते थे हिमालय की चढ़ाई हो गई

Tanoj Dadhich

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कल उस की आरती मैं ने उतारी मगर मत पूछना कैसे उतारी गले तक आ गई थी बात मेरे सो पानी पी लिया, नीचे उतारी उसे भी मौत ने कुछ दिन पुकारा वो जिस ने लाश पंखे से उतारी

Tanoj Dadhich

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कल तक जो शख़्स साथ मेरे था चला गया ऐसा लगा कि आँख में तिनका चला गया मिलने वो आए और अकेले ही आए हैं या'नी कि कैच छूट के चौका चला गया मैं बोल जब रहा था नहीं रोक पाए वो सो रात भर मैं शे'र सुनाता चला गया कमज़ोरियाँ बता के उसे सोचता हूँ मैं आटे में पानी हद से ज़ियादा चला गया बे-फ़िक्र था 'तनोज' ख़बर ही नहीं हुई वो पास आया, दिल को निकाला, चला गया

Tanoj Dadhich

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कोई गाली नहीं देता कोई ग़ुस्सा नहीं होता तो मैं मशहूर तो होता मगर इतना नहीं होता हम उस को घर नहीं कहते भले कितना बड़ा ही हो जहाँ तुलसी नहीं होती जहाँ मटका नहीं होता बुला लो सब बड़े शाइ'र मगर इक दो नए रखना शगुन पूरा नहीं होता अगर सिक्का नहीं होता ज़माना है नया अब वो मुहब्बत कर नहीं सकता वो जिस सेे एक भी रुपया कभी ख़र्चा नहीं होता तनोज इस बार तो लाओ नयापन शे'र में अपने कि बस इक नाम लिखने से कोई मक़्ता नहीं होता

Tanoj Dadhich

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कई लोगों से बेहतर हँस रहा है अगर तू अपने ऊपर हँस रहा है दशानन के अहम को तोड़ कर के बहुत छोटा सा बंदर हँस रहा है मुझे कोई नहीं ख़त भेजता अब मेरी छत का कबूतर हँस रहा है मुक़द्दर पर ये मेहनत हँस रही है ? या मेहनत पर मुक़द्दर हँस रहा है ? हज़ारों ग़म हैं उस की ज़िन्दगी में मगर फिर भी सुख़न-वर हँस रहा है कहा मैं ने कि दुनिया जीतनी है न जाने क्यूँ सिकन्दर हँस रहा है

Tanoj Dadhich

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