ghazalKuch Alfaaz

साज़ तैयार कर रहा हूँ मैं और खबरदार कर रहा हूँ मैं तुम को शायद बुरा लगे, लेकिन देख के प्यार कर रहा हूँ मैं हाँ! नहीं चाहिए ये ताज और तख़्त साफ़ इनकार कर रहा हूँ मैं कोई जा कर उसे बता तो दे जिस का किरदार कर रहा हूँ मैं आज से, ख़ुद को तेरी हालत से दस्तबरदार कर रहा हूँ मैं दो जहाँ मुझ को मिल रहे हैं, मगर तुझ पर इसरार कर रहा हूँ मैं

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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अदा-ए-इश्क़ हूँ पूरी अना के साथ हूँ मैं ख़ुद अपने साथ हूँ या'नी ख़ुदा के साथ हूँ मैं मुजावरान-ए-हवस तंग हैं कि यूँँ कैसे बग़ैर शर्म-ओ-हया भी हया के साथ हूँ मैं सफ़र शुरूअ' तो होने दे अपने साथ मिरा तू ख़ुद कहेगा ये कैसी बला के साथ हूँ मैं मैं छू गया तो तिरा रंग काट डालूँगा सो अपने आप से तुझ को बचा के साथ हूँ मैं दुरूद-बर-दिल-ए-वहशी सलाम-बर-तप-ए-इश्क़ ख़ुद अपनी हम्द ख़ुद अपनी सना के साथ हूँ मैं यही तो फ़र्क़ है मेरे और उन के हल के बीच शिकायतें हैं उन्हें और रज़ा के साथ हूँ मैं मैं अव्वलीन की इज़्ज़त में आख़िरीन का नूर वो इंतिहा हूँ कि हर इब्तिदा के साथ हूँ मैं दिखाई दूँ भी तो कैसे सुनाई दूँ भी तो क्यूँँ वरा-ए-नक़्श-ओ-नवा हूँ फ़ना के साथ हूँ मैं ब-हुक्म-ए-यार लवें कब्ज़ करने आती है बुझा रही है? बुझाए हवा के साथ हूँ मैं ये साबिरीन-ए-मोहब्बत ये काशिफ़ीन-ए-जुनूँ इन्ही के संग इन्हीं औलिया के साथ हूँ मैं किसी के साथ नहीं हूँ मगर जमाल-ए-इलाहा तिरी क़िस्म तिरे हर मुब्तला के साथ हूँ मैं ज़माने भर को पता है मैं किस तरीक़ पे हूँ सभी को इल्म है किस दिल-रुबा के साथ हूँ मैं मुनाफ़िक़ीन-ए-तसव्वुफ़ की मौत हूँ मैं 'अली' हर इक असील हर इक बे-रिया के साथ हूँ मैं

Ali Zaryoun

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चुप-चाप क्यूँ फिरो हो कोई बात तो करो हल भी निकालते हैं मुलाक़ात तो करो ख़ाली हवा में उड़ना फकीरी नहीं मियाँ दिल जोड़ के दिखाओ करामात तो करो

Ali Zaryoun

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जागना और जगा के सो जाना रात को दिन बना के सो जाना टेक्स्ट करना तमाम रात उस को उँगलियों को दबा के सो जाना आज फिर देर से घर आया हूँ आज फिर मुँह बना के सो जाना

Ali Zaryoun

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हो जिसे यार से तस्दीक़ नहीं कर सकता वो किसी शे'र की तज़हीक नहीं कर सकता पुर-कशिश दोस्त मेरे हिज्र की मजबूरी समझ मैं तुझे दूर से नज़दीक नहीं कर सकता मुझ पे तनक़ीद से रहते हैं उजाले जिन में उन दुकानों को मैं तारीक नहीं कर सकता कौन से ग़म से निकलना है किसे रखना है मस‌अला ये है मैं तफरीक नहीं कर सकता पेड़ को गालियां बकने के इलावा ज़रयून क्या करें वो के जो तख़्लीक़ नहीं कर सकता शे'र तो ख़ैर मैं तन्हाई में कह लूगा अली अपनी हालत तो मैं ख़ुद ठीक नहीं कर सकता हिज्र से गुजरे बिना इश्क़ बताने वाला बहस कर सकता है तहक़ीक़ नहीं कर सकता

Ali Zaryoun

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चमकते दिन बहुत चालाक है शब जानती है उसे पहले नहीं मालूम था अब जानती है ये रिश्तेदार उस को इस लिए झुठला रहे हैं वो रिश्ता माँगने वालों का मतलब जानती है जो दुख उस ने सहे हैं उस की बेटी तो ना देखे वो मां है और मां होने का मनसब जानती है ये अगली रौ में बैठी मुझ सेे सर्वत सुनने वाली मैं उस के वास्ते आया हूँ ये सब‌ जानती हैं

Ali Zaryoun

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