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shu'uri tajrabe se din guzarne vaale 'ajib log hain naqlen utarne vaale khuda mila na sukun akhri dinon men bhi khamosh ho gae qismat sanvarne vaale hasin ladki mohabbat koi nisab nahin ki taap kar len ise ratta marne vaale unhi se aaj miri jaan ko khatra lahiq hai kabhi jo log the jaan mujh pe varne vaale shu'ur-e-zist bhi dete nai bahar ke saath lahu ki buund men ehsas ubharne vaale vo din kahan gae jab tu khuda bana hua tha ai bebasi men khuda ko pukarne vaale shu'uri tajrabe se din guzarne wale 'ajib log hain naqlen utarne wale khuda mila na sukun aakhri dinon mein bhi khamosh ho gae qismat sanwarne wale hasin ladki mohabbat koi nisab nahin ki tap kar len ise ratta marne wale unhi se aaj meri jaan ko khatra lahiq hai kabhi jo log the jaan mujh pe warne wale shu'ur-e-zist bhi dete nai bahaar ke sath lahu ki bund mein ehsas ubhaarne wale wo din kahan gae jab tu khuda bana hua tha ai bebasi mein khuda ko pukarne wale

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

Ahmad Faraz

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आईने आँख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था एक याद बसर करती थी मुझे मैं साँस नहीं ले पाता था एक शख़्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी रोता था तो रात उजड़ जाती हँसता था तो दिन बन जाता था मैं रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जा कर वो फोन उठाता था मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था हम एक ज़िंदान में ज़िंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था वो जिस्म नज़र-अंदाज़ नहीं हो पाता था इन आँखों से मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था

Tehzeeb Hafi

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तुम्हारा रंग दुनिया ने छुआ था तब कहाँ थे तुम? हमारा कैनवस ख़ाली पड़ा था तब कहाँ थे तुम? मेरे लशकर में शिरकत की इजाज़त माँगने वालो! मैं परचम थाम कर तन्हा खड़ा था तब कहाँ थे तुम? तुम्हारी दस्तकों पर रहम आता है मुझे लेकिन ये दरवाज़ा कई दिन से खुला था तब कहाँ थे तुम? फलों पर हक़ जताने आए हो तो ये भी बतला दो मैं जब पौधों को पानी दे रहा था तब कहाँ थे तुम? ये बस इक रस्मिया तफ़तीश है, आराम से बैठो वफ़ा का ख़ून जिस शब को हुआ था तब कहाँ थे तुम? मुआ'फ़ी चाहता हूँ अब तो बस ख़बरों से मतलब है मैं जब रूमानी फ़िल्में देखता था तब कहाँ थे तुम?

Zubair Ali Tabish

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आँखों के साथ उसे मिरा हँसना नहीं पसंद दरिया हो या हो घाव उसे गहरा नहीं पसंद तारीख़ आ चुकी है उधर कार्ड छप गए अब कब कहेगी तुझ को वो लड़का नहीं पसंद तुम को तो मुझ से गुफ़्तुगू करना पसंद था अब क्यूँ मिरी मज़ार पे रुकना नहीं पसंद कपड़ों से इत्र तक या किताबों से हार तक वो बोले तो सही कि उसे क्या नहीं पसंद इक दिन पड़ा मिला था मुझे रास्तों पे और इक दिन सुना उसे मिरा छूना नहीं पसंद

Kushal Dauneria

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