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सिम्पल भोली भाली लड़की, हाए रे दोस्त के जैसी प्यारी लड़की, हाए रे एक शराबी बुत से माँगे व्हिस्की और व्हिस्की पीने वाली लड़की, हाए रे ये तो बिल्कुल सपने जैसी बात हुई जैसा सोचा वैसी लड़की, हाए रे बात मुसलसल करता रहता हूँ उस सेे मेरे यारों जैसी लड़की, हाए रे पतली खम्बे जैसी लड़की से तौबा लंबी चौड़ी भारी लड़की, हाए रे

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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

Umair Najmi

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सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जाएगा हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िंदगी ने कह दिया तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जाएगा मैं ख़ुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तो ज़हर भी इस में अगर होगा दवा हो जाएगा सब उसी के हैं हवा ख़ुशबू ज़मीन ओ आसमाँ मैं जहाँ भी जाऊँगा उस को पता हो जाएगा

Bashir Badr

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बस इक निगाह-ए-नाज़ को तरसा हुआ था मैं हालांकि शहर-शहर में फैला हुआ था मैं मुद्दत के बा'द आइना देखा तो रो पड़ा किस बेहतरीन दोस्त से रूठा हुआ था मैं पहना जो रेनकोट तो बारिश नहीं हुई लौटा जो घर तो शर्म से भीगा हुआ था मैं पहले भी दी गई थी मुझे बज़्म की दुआ पहले भी इस दुआ पे अकेला हुआ था मैं कितनी अजीब बात है ना! तू ही आ गया! तेरे ही इंतिज़ार में बैठा हुआ था मैं

Zubair Ali Tabish

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आप जैसों के लिए इस में रखा कुछ भी नहीं लेकिन ऐसा तो न कहिए कि वफ़ा कुछ भी नहीं आप कहिए तो निभाते चले जाएँगे मगर इस तअ'ल्लुक़ में अज़िय्यत के सिवा कुछ भी नहीं मैं किसी तरह भी समझौता नहीं कर सकता या तो सब कुछ ही मुझे चाहिए या कुछ भी नहीं कैसे जाना है कहाँ जाना है क्यूँँ जाना है हम कि चलते चले जाते हैं पता कुछ भी नहीं हाए इस शहर की रौनक़ के मैं सदक़े जाऊँ ऐसी भरपूर है जैसे कि हुआ कुछ भी नहीं फिर कोई ताज़ा सुख़न दिल में जगह करता है जब भी लगता है कि लिखने को बचा कुछ भी नहीं अब मैं क्या अपनी मोहब्बत का भरम भी न रखूँ मान लेता हूँ कि उस शख़्स में था कुछ भी नहीं मैं ने दुनिया से अलग रह के भी देखा 'जव्वाद' ऐसी मुँह-ज़ोर उदासी की दवा कुछ भी नहीं

Jawwad Sheikh

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हाँ ये सच है कि मोहब्बत नहीं की दोस्त बस मेरी तबीयत नहीं की इस लिए गांव मैं सैलाब आया हम ने दरियाओ की इज़्ज़त नहीं की जिस्म तक उस ने मुझे सौंप दिया दिल ने इस पर भी कनायत नहीं की मेरे ए'जाज़ में रखी गई थी मैं ने जिस बज़्म में शिरकत नहीं की याद भी याद से रखा उस को भूल जाने में भी गफलत नहीं की उस को देखा था अजब हालत में फिर कभी उस की हिफाज़त नहीं की हम अगर फतह हुए है तो क्या इश्क़ ने किस पे हकूमत नहीं की

Tehzeeb Hafi

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