ghazalKuch Alfaaz

तमाम उम्र मैं हर सुब्ह की अज़ान के बा'द इक इम्तिहान से गुज़रा एक इम्तिहान के बा'द ख़ुदा करे कि कहीं और गर्दिश-ए-तक़दीर किसी का घर न उजाड़े मेरे मकान के बा'द धरा ही क्या है मेरे पास नज़्र करने को तेरे हुज़ूर मेरी जान मेरी जान के बा'द ये राज़ उस पे खुलेगा जो ख़ुद को पहचाने कि इक यक़ीन की मंज़िल भी है गुमान के बा'द ये जुर्म कम है कि सच्चाई का भरम रक्खा सज़ा तो होनी थी मुझ को मेरे बयान के बा'द मेरे ख़ुदा उसे अपनी अमान में रखना जो बच गया है मेरे खेत में लगान के बा'द

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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कौन पुर्सान-ए-हाल है मेरा ज़िंदा रहना कमाल है मेरा तू नहीं तो तिरा ख़याल सही कोई तो हम-ख़याल है मेरा मेरे आसाब दे रहे हैं जवाब हौसला कब निढाल है मेरा चढ़ता सूरज बता रहा है मुझे बस यहीं से ज़वाल है मेरा सब की नज़रें मिरी निगाह में हैं किस को कितना ख़याल है मेरा

Saqi Amrohvi

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मंज़िलें लाख कठिन आएँ गुज़र जाऊँगा हौसला हार के बैठूँगा तो मर जाऊँगा चल रहे थे जो मेरे साथ कहाँ हैं वो लोग जो ये कहते थे कि रस्ते में बिखर जाऊँगा दर-ब-दर होने से पहले कभी सोचा भी न था घर मुझे रास न आया तो किधर जाऊँगा याद रक्खे मुझे दुनिया तिरी तस्वीर के साथ रंग ऐसे तिरी तस्वीर में भर जाऊँगा लाख रोकें ये अँधेरे मिरा रस्ता लेकिन मैं जिधर रौशनी जाएगी उधर जाऊँगा रास आई न मोहब्बत मुझे वर्ना 'साक़ी' मैं ने सोचा था कि हर दिल में उतर जाऊँगा

Saqi Amrohvi

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