तिरी गली से गुज़रने को सर झुकाए हुए फ़क़ीर हुजरा-ए-हफ़्त-आसमाँ उठाए हुए कोई दरख़्त सराए कि जिस में जा बैठें परिंदे अपनी परेशानियाँ भुलाए हुए मिरे सवाल वही टूट-फूट की ज़द में जवाब उन के वही हैं बने-बनाए हुए हमें जो देखते थे जिन को देखते थे हम वो ख़्वाब ख़ाक हुए और वो लोग साए हुए शिकारियों से मिरे एहतिजाज में 'बाबर' दरख़्त आज भी शामिल थे हाथ उठाए हुए
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो
Fazil Jamili
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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
Ahmad Faraz
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आईने आँख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था एक याद बसर करती थी मुझे मैं साँस नहीं ले पाता था एक शख़्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी रोता था तो रात उजड़ जाती हँसता था तो दिन बन जाता था मैं रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जा कर वो फोन उठाता था मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था हम एक ज़िंदान में ज़िंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था वो जिस्म नज़र-अंदाज़ नहीं हो पाता था इन आँखों से मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था
Tehzeeb Hafi
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चल दिए फेर कर नज़र तुम भी ग़ैर तो ग़ैर थे मगर तुम भी ये गली मेरे दिलरुबा की है दोस्तों ख़ैरियत इधर तुम भी मुझ पे लोगों के साथ हँसते हो लोग रोएँगे ख़ास कर तुम भी मुझ को ठुकरा दिया है दुनिया ने मैं तो मर जाऊँगा अगर तुम भी उस की गाड़ी तो जा चुकी 'ताबिश' अब उठो जाओ अपने घर तुम भी
Zubair Ali Tabish
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अब मसाफ़त में तो आराम नहीं आ सकता ये सितारा भी मिरे काम नहीं आ सकता ये मिरी सल्तनत-ए-ख़्वाब है आबाद रहो इस के अंदर कोई बहराम नहीं आ सकता जाने खिलते हुए फूलों को ख़बर है कि नहीं बाग़ में कोई सियह-फ़ाम नहीं आ सकता हर हवा-ख़्वाह ये कहता था कि महफ़ूज़ हूँ मैं बुझने वालों में मिरा नाम नहीं आ सकता मैं जिन्हें याद हूँ अब तक यही कहते होंगे शाहज़ादा कभी नाकाम नहीं आ सकता डर ही लगता है कि रस्ते में न रह जाऊँ कहीं कहलवा दीजिए में शाम नहीं आ सकता
Idris Babar
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वो गुल वो ख़्वाब-शार भी नहीं रहा सो दिल ये ख़ाकसार भी नहीं रहा ये दिल तो उस के नाम का पड़ाव है जहाँ वो एक बार भी नहीं रहा पड़ा है ख़ुद से वास्ता और इस के ब'अद किसी का ए'तिबार भी नहीं रहा ये रंज अपनी अस्ल शक्ल में है दोस्त कि मैं इसे सँवार भी नहीं रहा ये वक़्त भी गुज़र नहीं रहा है और मैं ख़ुद इसे गुज़ार भी नहीं रहा
Idris Babar
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एक दिन ख़्वाब-नगर जाना है और यूँँही ख़ाक-बसर जाना है उम्र भर की ये जो है बे-ख़्वाबी ये उसी ख़्वाब का हर्जाना है घर से किस वक़्त चले थे हम लोग ख़ैर अब कौन सा घर जाना है मौत की पहली अलामत साहिब यही एहसास का मर जाना है किसी तक़रीब-ए-जुदाई के बग़ैर ठीक है जाओ अगर जाना है शोर की धूल में गुम गलियों से दिल को चुप-चाप गुज़र जाना है
Idris Babar
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देखा नहीं चाँद ने पलट कर हम सो गए ख़्वाब से लिपट कर अब दिल में वो सब कहाँ है देखो बग़दाद कहानियों से हट कर शायद ये शजर वही हो जिस पर देखो तो ज़रा वरक़ उलट कर इक ख़ौफ़-ज़दा सा शख़्स घर तक पहुँचा कई रास्तों में बट कर काग़ज़ पे वो नज़्म खिल उठी है उग आया है फिर दरख़्त कट कर 'बाबर' ये परिंद थक गए थे बैठे हैं जो ख़ाक पर सिमट कर
Idris Babar
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किसी के हाथ कहाँ ये ख़ज़ाना आता है मिरे अज़ीज़ को हर इक बहाना आता है ज़रा सा मिल के दिखाओ कि ऐसे मिलते हैं बहुत पता है तुम्हें छोड़ जाना आता है सितारे देख के जलते हैं आँखें मलते हैं इक आदमी लिए शम-ए-फ़साना आता है अभी जज़ीरे पे हम तुम नए नए तो हैं दोस्त डरो नहीं मुझे सब कुछ बनाना आता है यहाँ चराग़ से आगे चराग़ जलता नहीं फ़क़त घराने के पीछे घराना आता है ये बात चलती है सीना-ब-सीना चलती है वो साथ आता है शाना-ब-शाना आता है गुलाब सिनेमा से पहले चाँद बाग़ के बा'द उतर पड़ूँगा जहाँ कारख़ाना आता है ये कह के उस ने सेमेस्टर ब्रेक कर डाला सुना था आप को लिखना लिखाना आता है ज़माने हो गए दरिया तो कह गया था मुझे बस एक मौज को कर के रवाना आता है छलक न जाए मिरा रंज मेरी आँखों से तुम्हें तो अपनी ख़ुशी को छुपाना आना है वो रोज़ भर के ख़लाई जहाज़ उड़ाते फिरें हमें भी रज के तमस्ख़ुर उड़ाना आता है पचास मील है ख़ुश्की से बहरिया-टाउन बस एक घंटे में अच्छा ज़माना आता है ब्रेक-डांस सिखाया है नाव ने दिल को हवा का गीत समुंदर को गाना आता है मुझे डीफ़ैंस की लिंगवा-फ़्रांका नईं आती तुम्हें तो सद्र का क़ौमी तराना आता है मुझे तो ख़ैर ज़मीं की ज़बाँ नहीं आती तुम्हें मिर्रीख़ का क़ौमी तराना आता है
Idris Babar
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