ghazalKuch Alfaaz

वो गुल वो ख़्वाब-शार भी नहीं रहा सो दिल ये ख़ाकसार भी नहीं रहा ये दिल तो उस के नाम का पड़ाव है जहाँ वो एक बार भी नहीं रहा पड़ा है ख़ुद से वास्ता और इस के ब'अद किसी का ए'तिबार भी नहीं रहा ये रंज अपनी अस्ल शक्ल में है दोस्त कि मैं इसे सँवार भी नहीं रहा ये वक़्त भी गुज़र नहीं रहा है और मैं ख़ुद इसे गुज़ार भी नहीं रहा

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो

Himanshi babra KATIB

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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तिरी गली से गुज़रने को सर झुकाए हुए फ़क़ीर हुजरा-ए-हफ़्त-आसमाँ उठाए हुए कोई दरख़्त सराए कि जिस में जा बैठें परिंदे अपनी परेशानियाँ भुलाए हुए मिरे सवाल वही टूट-फूट की ज़द में जवाब उन के वही हैं बने-बनाए हुए हमें जो देखते थे जिन को देखते थे हम वो ख़्वाब ख़ाक हुए और वो लोग साए हुए शिकारियों से मिरे एहतिजाज में 'बाबर' दरख़्त आज भी शामिल थे हाथ उठाए हुए

Idris Babar

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अब मसाफ़त में तो आराम नहीं आ सकता ये सितारा भी मिरे काम नहीं आ सकता ये मिरी सल्तनत-ए-ख़्वाब है आबाद रहो इस के अंदर कोई बहराम नहीं आ सकता जाने खिलते हुए फूलों को ख़बर है कि नहीं बाग़ में कोई सियह-फ़ाम नहीं आ सकता हर हवा-ख़्वाह ये कहता था कि महफ़ूज़ हूँ मैं बुझने वालों में मिरा नाम नहीं आ सकता मैं जिन्हें याद हूँ अब तक यही कहते होंगे शाहज़ादा कभी नाकाम नहीं आ सकता डर ही लगता है कि रस्ते में न रह जाऊँ कहीं कहलवा दीजिए में शाम नहीं आ सकता

Idris Babar

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एक दिन ख़्वाब-नगर जाना है और यूँँही ख़ाक-बसर जाना है उम्र भर की ये जो है बे-ख़्वाबी ये उसी ख़्वाब का हर्जाना है घर से किस वक़्त चले थे हम लोग ख़ैर अब कौन सा घर जाना है मौत की पहली अलामत साहिब यही एहसास का मर जाना है किसी तक़रीब-ए-जुदाई के बग़ैर ठीक है जाओ अगर जाना है शोर की धूल में गुम गलियों से दिल को चुप-चाप गुज़र जाना है

Idris Babar

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देखा नहीं चाँद ने पलट कर हम सो गए ख़्वाब से लिपट कर अब दिल में वो सब कहाँ है देखो बग़दाद कहानियों से हट कर शायद ये शजर वही हो जिस पर देखो तो ज़रा वरक़ उलट कर इक ख़ौफ़-ज़दा सा शख़्स घर तक पहुँचा कई रास्तों में बट कर काग़ज़ पे वो नज़्म खिल उठी है उग आया है फिर दरख़्त कट कर 'बाबर' ये परिंद थक गए थे बैठे हैं जो ख़ाक पर सिमट कर

Idris Babar

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किसी के हाथ कहाँ ये ख़ज़ाना आता है मिरे अज़ीज़ को हर इक बहाना आता है ज़रा सा मिल के दिखाओ कि ऐसे मिलते हैं बहुत पता है तुम्हें छोड़ जाना आता है सितारे देख के जलते हैं आँखें मलते हैं इक आदमी लिए शम-ए-फ़साना आता है अभी जज़ीरे पे हम तुम नए नए तो हैं दोस्त डरो नहीं मुझे सब कुछ बनाना आता है यहाँ चराग़ से आगे चराग़ जलता नहीं फ़क़त घराने के पीछे घराना आता है ये बात चलती है सीना-ब-सीना चलती है वो साथ आता है शाना-ब-शाना आता है गुलाब सिनेमा से पहले चाँद बाग़ के बा'द उतर पड़ूँगा जहाँ कारख़ाना आता है ये कह के उस ने सेमेस्टर ब्रेक कर डाला सुना था आप को लिखना लिखाना आता है ज़माने हो गए दरिया तो कह गया था मुझे बस एक मौज को कर के रवाना आता है छलक न जाए मिरा रंज मेरी आँखों से तुम्हें तो अपनी ख़ुशी को छुपाना आना है वो रोज़ भर के ख़लाई जहाज़ उड़ाते फिरें हमें भी रज के तमस्ख़ुर उड़ाना आता है पचास मील है ख़ुश्की से बहरिया-टाउन बस एक घंटे में अच्छा ज़माना आता है ब्रेक-डांस सिखाया है नाव ने दिल को हवा का गीत समुंदर को गाना आता है मुझे डीफ़ैंस की लिंगवा-फ़्रांका नईं आती तुम्हें तो सद्र का क़ौमी तराना आता है मुझे तो ख़ैर ज़मीं की ज़बाँ नहीं आती तुम्हें मिर्रीख़ का क़ौमी तराना आता है

Idris Babar

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