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देखा नहीं चाँद ने पलट कर हम सो गए ख़्वाब से लिपट कर अब दिल में वो सब कहाँ है देखो बग़दाद कहानियों से हट कर शायद ये शजर वही हो जिस पर देखो तो ज़रा वरक़ उलट कर इक ख़ौफ़-ज़दा सा शख़्स घर तक पहुँचा कई रास्तों में बट कर काग़ज़ पे वो नज़्म खिल उठी है उग आया है फिर दरख़्त कट कर 'बाबर' ये परिंद थक गए थे बैठे हैं जो ख़ाक पर सिमट कर

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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तिरी गली से गुज़रने को सर झुकाए हुए फ़क़ीर हुजरा-ए-हफ़्त-आसमाँ उठाए हुए कोई दरख़्त सराए कि जिस में जा बैठें परिंदे अपनी परेशानियाँ भुलाए हुए मिरे सवाल वही टूट-फूट की ज़द में जवाब उन के वही हैं बने-बनाए हुए हमें जो देखते थे जिन को देखते थे हम वो ख़्वाब ख़ाक हुए और वो लोग साए हुए शिकारियों से मिरे एहतिजाज में 'बाबर' दरख़्त आज भी शामिल थे हाथ उठाए हुए

Idris Babar

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एक दिन ख़्वाब-नगर जाना है और यूँँही ख़ाक-बसर जाना है उम्र भर की ये जो है बे-ख़्वाबी ये उसी ख़्वाब का हर्जाना है घर से किस वक़्त चले थे हम लोग ख़ैर अब कौन सा घर जाना है मौत की पहली अलामत साहिब यही एहसास का मर जाना है किसी तक़रीब-ए-जुदाई के बग़ैर ठीक है जाओ अगर जाना है शोर की धूल में गुम गलियों से दिल को चुप-चाप गुज़र जाना है

Idris Babar

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अब मसाफ़त में तो आराम नहीं आ सकता ये सितारा भी मिरे काम नहीं आ सकता ये मिरी सल्तनत-ए-ख़्वाब है आबाद रहो इस के अंदर कोई बहराम नहीं आ सकता जाने खिलते हुए फूलों को ख़बर है कि नहीं बाग़ में कोई सियह-फ़ाम नहीं आ सकता हर हवा-ख़्वाह ये कहता था कि महफ़ूज़ हूँ मैं बुझने वालों में मिरा नाम नहीं आ सकता मैं जिन्हें याद हूँ अब तक यही कहते होंगे शाहज़ादा कभी नाकाम नहीं आ सकता डर ही लगता है कि रस्ते में न रह जाऊँ कहीं कहलवा दीजिए में शाम नहीं आ सकता

Idris Babar

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दोस्त कुछ और भी हैं तेरे अलावा मेरे दोस्त कई सहरा मेरे हमदम कई दरिया मेरे दोस्त तू भी हो मैं भी हूँ इक जगह पे और वक़्त भी हो इतनी गुंजाइशें रखती नहीं दुनिया मेरे दोस्त तेरी आँखों पे मेरा ख़्वाब-ए-सफ़र ख़त्म हुआ जैसे साहिल पे उतर जाए सफ़ीना मेरे दोस्त ज़ीस्त बे-मा'नी वही बे-सर-ओ-सामानी वही फिर भी जब तक है तेरी धूप का साया मेरे दोस्त अब तो लगता है जुदाई का सबब कुछ भी न था आदमी भूल भी सकता है न रस्ता मेरे दोस्त राह तकते हैं कहीं दूर कई सुस्त चराग़ और हवा तेज़ हुई जाती है अच्छा मेरे दोस्त

Idris Babar

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वो गुल वो ख़्वाब-शार भी नहीं रहा सो दिल ये ख़ाकसार भी नहीं रहा ये दिल तो उस के नाम का पड़ाव है जहाँ वो एक बार भी नहीं रहा पड़ा है ख़ुद से वास्ता और इस के ब'अद किसी का ए'तिबार भी नहीं रहा ये रंज अपनी अस्ल शक्ल में है दोस्त कि मैं इसे सँवार भी नहीं रहा ये वक़्त भी गुज़र नहीं रहा है और मैं ख़ुद इसे गुज़ार भी नहीं रहा

Idris Babar

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