ghazalKuch Alfaaz

दोस्त कुछ और भी हैं तेरे अलावा मेरे दोस्त कई सहरा मेरे हमदम कई दरिया मेरे दोस्त तू भी हो मैं भी हूँ इक जगह पे और वक़्त भी हो इतनी गुंजाइशें रखती नहीं दुनिया मेरे दोस्त तेरी आँखों पे मेरा ख़्वाब-ए-सफ़र ख़त्म हुआ जैसे साहिल पे उतर जाए सफ़ीना मेरे दोस्त ज़ीस्त बे-मा'नी वही बे-सर-ओ-सामानी वही फिर भी जब तक है तेरी धूप का साया मेरे दोस्त अब तो लगता है जुदाई का सबब कुछ भी न था आदमी भूल भी सकता है न रस्ता मेरे दोस्त राह तकते हैं कहीं दूर कई सुस्त चराग़ और हवा तेज़ हुई जाती है अच्छा मेरे दोस्त

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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तिरी गली से गुज़रने को सर झुकाए हुए फ़क़ीर हुजरा-ए-हफ़्त-आसमाँ उठाए हुए कोई दरख़्त सराए कि जिस में जा बैठें परिंदे अपनी परेशानियाँ भुलाए हुए मिरे सवाल वही टूट-फूट की ज़द में जवाब उन के वही हैं बने-बनाए हुए हमें जो देखते थे जिन को देखते थे हम वो ख़्वाब ख़ाक हुए और वो लोग साए हुए शिकारियों से मिरे एहतिजाज में 'बाबर' दरख़्त आज भी शामिल थे हाथ उठाए हुए

Idris Babar

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अब मसाफ़त में तो आराम नहीं आ सकता ये सितारा भी मिरे काम नहीं आ सकता ये मिरी सल्तनत-ए-ख़्वाब है आबाद रहो इस के अंदर कोई बहराम नहीं आ सकता जाने खिलते हुए फूलों को ख़बर है कि नहीं बाग़ में कोई सियह-फ़ाम नहीं आ सकता हर हवा-ख़्वाह ये कहता था कि महफ़ूज़ हूँ मैं बुझने वालों में मिरा नाम नहीं आ सकता मैं जिन्हें याद हूँ अब तक यही कहते होंगे शाहज़ादा कभी नाकाम नहीं आ सकता डर ही लगता है कि रस्ते में न रह जाऊँ कहीं कहलवा दीजिए में शाम नहीं आ सकता

Idris Babar

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देखा नहीं चाँद ने पलट कर हम सो गए ख़्वाब से लिपट कर अब दिल में वो सब कहाँ है देखो बग़दाद कहानियों से हट कर शायद ये शजर वही हो जिस पर देखो तो ज़रा वरक़ उलट कर इक ख़ौफ़-ज़दा सा शख़्स घर तक पहुँचा कई रास्तों में बट कर काग़ज़ पे वो नज़्म खिल उठी है उग आया है फिर दरख़्त कट कर 'बाबर' ये परिंद थक गए थे बैठे हैं जो ख़ाक पर सिमट कर

Idris Babar

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एक दिन ख़्वाब-नगर जाना है और यूँँही ख़ाक-बसर जाना है उम्र भर की ये जो है बे-ख़्वाबी ये उसी ख़्वाब का हर्जाना है घर से किस वक़्त चले थे हम लोग ख़ैर अब कौन सा घर जाना है मौत की पहली अलामत साहिब यही एहसास का मर जाना है किसी तक़रीब-ए-जुदाई के बग़ैर ठीक है जाओ अगर जाना है शोर की धूल में गुम गलियों से दिल को चुप-चाप गुज़र जाना है

Idris Babar

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किसी के हाथ कहाँ ये ख़ज़ाना आता है मिरे अज़ीज़ को हर इक बहाना आता है ज़रा सा मिल के दिखाओ कि ऐसे मिलते हैं बहुत पता है तुम्हें छोड़ जाना आता है सितारे देख के जलते हैं आँखें मलते हैं इक आदमी लिए शम-ए-फ़साना आता है अभी जज़ीरे पे हम तुम नए नए तो हैं दोस्त डरो नहीं मुझे सब कुछ बनाना आता है यहाँ चराग़ से आगे चराग़ जलता नहीं फ़क़त घराने के पीछे घराना आता है ये बात चलती है सीना-ब-सीना चलती है वो साथ आता है शाना-ब-शाना आता है गुलाब सिनेमा से पहले चाँद बाग़ के बा'द उतर पड़ूँगा जहाँ कारख़ाना आता है ये कह के उस ने सेमेस्टर ब्रेक कर डाला सुना था आप को लिखना लिखाना आता है ज़माने हो गए दरिया तो कह गया था मुझे बस एक मौज को कर के रवाना आता है छलक न जाए मिरा रंज मेरी आँखों से तुम्हें तो अपनी ख़ुशी को छुपाना आना है वो रोज़ भर के ख़लाई जहाज़ उड़ाते फिरें हमें भी रज के तमस्ख़ुर उड़ाना आता है पचास मील है ख़ुश्की से बहरिया-टाउन बस एक घंटे में अच्छा ज़माना आता है ब्रेक-डांस सिखाया है नाव ने दिल को हवा का गीत समुंदर को गाना आता है मुझे डीफ़ैंस की लिंगवा-फ़्रांका नईं आती तुम्हें तो सद्र का क़ौमी तराना आता है मुझे तो ख़ैर ज़मीं की ज़बाँ नहीं आती तुम्हें मिर्रीख़ का क़ौमी तराना आता है

Idris Babar

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