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तीरगी ताक़ में जड़ी हुई है धूप दहलीज़ पर पड़ी हुई है दिल पे नाकामियों के हैं पैवंद आस की सोई भी गड़ी हुई है मेरे जैसी है मेरी परछाईं धूप में पल के ये बड़ी हुई है घेर रक्खा है ना-रसाई ने और ख़्वाहिश वहीं खड़ी हुई है मैं ने तस्वीर फेंक दी है मगर कील दीवार में गड़ी हुई है हारता भी नहीं ग़म-ए-दौराँ ज़िद पे उम्मीद भी अड़ी हुई है दिल किसी के ख़याल में है गुम रात को ख़्वाब की पड़ी हुई है

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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जहल को आगही बनाते हुए मिल गया रौशनी बनाते हुए क्या क़यामत किसी पे गुज़रेगी आख़िरी आदमी बनाते हुए क्या हुआ था ज़रा पता तो चले वक़्त क्या था घड़ी बनाते हुए कैसे कैसे बना दिए चेहरे अपनी बे-चेहरगी बनाते हुए दश्त की वुसअतें बढ़ाती थीं मेरी आवारगी बनाते हुए उस ने नासूर कर लिया होगा ज़ख़्म को शाएरी बनाते हुए

Ammar Iqbal

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यूँँही बे-बाल-ओ-पर खड़े हुए हैं हम क़फ़स तोड़ कर खड़े हुए हैं दश्त गुज़रा है मेरे कमरे से और दीवार-ओ-दर खड़े हुए हैं ख़ुद ही जाने लगे थे और ख़ुद ही रास्ता रोक कर खड़े हुए हैं और कितनी घुमाओगे दुनिया हम तो सर थाम कर खड़े हुए हैं बरगुज़ीदा बुज़ुर्ग नीम के पेड़ थक गए हैं मगर खड़े हुए हैं मुद्दतों से हज़ार-हा आलम एक उम्मीद पर खड़े हुए हैं

Ammar Iqbal

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ख़ुद-परस्ती से इश्क़ हो गया है अपनी हस्ती से इश्क़ हो गया है जब से देखा है इस फ़क़ीरनी को फ़ाक़ा-मस्ती से इश्क़ हो गया है एक दरवेश को तिरी ख़ातिर सारी बस्ती से इश्क़ हो गया है ख़ुद तराशा है जब से बुत अपना बुत-परस्ती से इश्क़ हो गया है ये फ़लक-ज़ाद की कहानी है इस को पस्ती से इश्क़ हो गया है

Ammar Iqbal

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रात से जंग कोई खेल नईं तुम चराग़ों में इतना तेल नईं आ गया हूँ तो खींच अपनी तरफ़ मेरी जानिब मुझे धकेल नईं जब मैं चाहूँगा छोड़ जाऊँगा इक सराए है जिस्म जेल नईं बेंच देखी है ख़्वाब में ख़ाली और पटरी पर उस पे रेल नईं जिस को देखा था कल दरख़्त के गिर्द वो हरा अज़दहा था बेल नईं

Ammar Iqbal

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पहले हमारी आँख में बीनाई आई थी फिर इस के बा'द क़ुव्वत-ए-गोयाई आई थी मैं अपनी ख़स्तगी से हुआ और पाएदार मेरी थकन से मुझ में तवानाई आई थी दिल आज शाम से ही उसे ढूँडने लगा कल जिस के बा'द कमरे में तन्हाई आई थी वो किस की नग़्मगी थी जो दारों सरों में थी रंगों में किस के रंग से रा'नाई आई थी फिर यूँँ हुआ कि उस को तमन्नाई कर लिया मेरी तरफ़ जो चश्म-ए-तमाशाई आई थी

Ammar Iqbal

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