ख़ुद-परस्ती से इश्क़ हो गया है अपनी हस्ती से इश्क़ हो गया है जब से देखा है इस फ़क़ीरनी को फ़ाक़ा-मस्ती से इश्क़ हो गया है एक दरवेश को तिरी ख़ातिर सारी बस्ती से इश्क़ हो गया है ख़ुद तराशा है जब से बुत अपना बुत-परस्ती से इश्क़ हो गया है ये फ़लक-ज़ाद की कहानी है इस को पस्ती से इश्क़ हो गया है
Related Ghazal
थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए
Tehzeeb Hafi
262 likes
तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
249 likes
बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
196 likes
तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया
Tehzeeb Hafi
203 likes
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
130 likes
More from Ammar Iqbal
तीरगी ताक़ में जड़ी हुई है धूप दहलीज़ पर पड़ी हुई है दिल पे नाकामियों के हैं पैवंद आस की सोई भी गड़ी हुई है मेरे जैसी है मेरी परछाईं धूप में पल के ये बड़ी हुई है घेर रक्खा है ना-रसाई ने और ख़्वाहिश वहीं खड़ी हुई है मैं ने तस्वीर फेंक दी है मगर कील दीवार में गड़ी हुई है हारता भी नहीं ग़म-ए-दौराँ ज़िद पे उम्मीद भी अड़ी हुई है दिल किसी के ख़याल में है गुम रात को ख़्वाब की पड़ी हुई है
Ammar Iqbal
2 likes
जहल को आगही बनाते हुए मिल गया रौशनी बनाते हुए क्या क़यामत किसी पे गुज़रेगी आख़िरी आदमी बनाते हुए क्या हुआ था ज़रा पता तो चले वक़्त क्या था घड़ी बनाते हुए कैसे कैसे बना दिए चेहरे अपनी बे-चेहरगी बनाते हुए दश्त की वुसअतें बढ़ाती थीं मेरी आवारगी बनाते हुए उस ने नासूर कर लिया होगा ज़ख़्म को शाएरी बनाते हुए
Ammar Iqbal
9 likes
पहले हमारी आँख में बीनाई आई थी फिर इस के बा'द क़ुव्वत-ए-गोयाई आई थी मैं अपनी ख़स्तगी से हुआ और पाएदार मेरी थकन से मुझ में तवानाई आई थी दिल आज शाम से ही उसे ढूँडने लगा कल जिस के बा'द कमरे में तन्हाई आई थी वो किस की नग़्मगी थी जो दारों सरों में थी रंगों में किस के रंग से रा'नाई आई थी फिर यूँँ हुआ कि उस को तमन्नाई कर लिया मेरी तरफ़ जो चश्म-ए-तमाशाई आई थी
Ammar Iqbal
3 likes
ज़रा सी देर जले जल के राख हो जाए वो रौशनी दे भले जल के राख हो जाए वो आफ़्ताब जिसे सब सलाम करते हैं जो वक़्त पर न ढले जल के राख हो जाए मैं दूर जा के कहीं बाँसुरी बजाऊँगा बला से रोम जले जल के राख हो जाए वो एक लम्स-ए-गुरेज़ाँ है आतिश-ए-बे-सोज़ मुझे लगाए गले जल के राख हो जाए कोई चराग़ बचे सुब्ह तक तो तारीकी उसी चराग़-तले जल के राख हो जाए
Ammar Iqbal
2 likes
यूँँही बे-बाल-ओ-पर खड़े हुए हैं हम क़फ़स तोड़ कर खड़े हुए हैं दश्त गुज़रा है मेरे कमरे से और दीवार-ओ-दर खड़े हुए हैं ख़ुद ही जाने लगे थे और ख़ुद ही रास्ता रोक कर खड़े हुए हैं और कितनी घुमाओगे दुनिया हम तो सर थाम कर खड़े हुए हैं बरगुज़ीदा बुज़ुर्ग नीम के पेड़ थक गए हैं मगर खड़े हुए हैं मुद्दतों से हज़ार-हा आलम एक उम्मीद पर खड़े हुए हैं
Ammar Iqbal
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Ammar Iqbal.
Similar Moods
More moods that pair well with Ammar Iqbal's ghazal.







