ज़रा सी देर जले जल के राख हो जाए वो रौशनी दे भले जल के राख हो जाए वो आफ़्ताब जिसे सब सलाम करते हैं जो वक़्त पर न ढले जल के राख हो जाए मैं दूर जा के कहीं बाँसुरी बजाऊँगा बला से रोम जले जल के राख हो जाए वो एक लम्स-ए-गुरेज़ाँ है आतिश-ए-बे-सोज़ मुझे लगाए गले जल के राख हो जाए कोई चराग़ बचे सुब्ह तक तो तारीकी उसी चराग़-तले जल के राख हो जाए
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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना
Zubair Ali Tabish
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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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यूँँही बे-बाल-ओ-पर खड़े हुए हैं हम क़फ़स तोड़ कर खड़े हुए हैं दश्त गुज़रा है मेरे कमरे से और दीवार-ओ-दर खड़े हुए हैं ख़ुद ही जाने लगे थे और ख़ुद ही रास्ता रोक कर खड़े हुए हैं और कितनी घुमाओगे दुनिया हम तो सर थाम कर खड़े हुए हैं बरगुज़ीदा बुज़ुर्ग नीम के पेड़ थक गए हैं मगर खड़े हुए हैं मुद्दतों से हज़ार-हा आलम एक उम्मीद पर खड़े हुए हैं
Ammar Iqbal
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जहल को आगही बनाते हुए मिल गया रौशनी बनाते हुए क्या क़यामत किसी पे गुज़रेगी आख़िरी आदमी बनाते हुए क्या हुआ था ज़रा पता तो चले वक़्त क्या था घड़ी बनाते हुए कैसे कैसे बना दिए चेहरे अपनी बे-चेहरगी बनाते हुए दश्त की वुसअतें बढ़ाती थीं मेरी आवारगी बनाते हुए उस ने नासूर कर लिया होगा ज़ख़्म को शाएरी बनाते हुए
Ammar Iqbal
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पहले हमारी आँख में बीनाई आई थी फिर इस के बा'द क़ुव्वत-ए-गोयाई आई थी मैं अपनी ख़स्तगी से हुआ और पाएदार मेरी थकन से मुझ में तवानाई आई थी दिल आज शाम से ही उसे ढूँडने लगा कल जिस के बा'द कमरे में तन्हाई आई थी वो किस की नग़्मगी थी जो दारों सरों में थी रंगों में किस के रंग से रा'नाई आई थी फिर यूँँ हुआ कि उस को तमन्नाई कर लिया मेरी तरफ़ जो चश्म-ए-तमाशाई आई थी
Ammar Iqbal
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तीरगी ताक़ में जड़ी हुई है धूप दहलीज़ पर पड़ी हुई है दिल पे नाकामियों के हैं पैवंद आस की सोई भी गड़ी हुई है मेरे जैसी है मेरी परछाईं धूप में पल के ये बड़ी हुई है घेर रक्खा है ना-रसाई ने और ख़्वाहिश वहीं खड़ी हुई है मैं ने तस्वीर फेंक दी है मगर कील दीवार में गड़ी हुई है हारता भी नहीं ग़म-ए-दौराँ ज़िद पे उम्मीद भी अड़ी हुई है दिल किसी के ख़याल में है गुम रात को ख़्वाब की पड़ी हुई है
Ammar Iqbal
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मर्तबा था मकाम था मेरा रौशनी पर कयाम था मेरा मैं ही भेजा गया था पहले भी तब कोई और नाम था मेरा आख़िरी वक़्त आँख खुल गई थी वरना क़िस्सा तमाम था मेरा
Ammar Iqbal
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