tujh se badh kar koi pyara bhi nahin ho sakta par tira saath gavara bhi nahin ho sakta rasta bhi ghhalat ho sakta hai manzil bhi ghhalat har sitara to sitara bhi nahin ho sakta paanv rakhte hi phisal sakta hai mitti ho ki ret har kinara to kinara bhi nahin ho sakta us tak avaz pahunchni bhi badi mushkil hai aur na dekhe to ishara bhi nahin ho sakta tere bandon ki maishat ka ajab haal hua aish kaisa ki guzara bhi nahin ho sakta apna dushman hi dikhai nahin deta ho jise aisa lashkar to saf-ara bhi nahin ho sakta pahle hi lazzat-e-inkar se vaqif nahin jo us se inkar dobara bhi nahin ho sakta husn aisa ki chaka-chaund hui hain ankhen hairat aisi ki nazzara bhi nahin ho sakta chaliye vo shakhs hamara to kabhi tha hi nahin dukh to ye hai ki tumhara bhi nahin ho sakta duniya achchhi bhi nahin lagti ham aison ko 'salim' aur duniya se kinara bhi nahin ho sakta tujh se badh kar koi pyara bhi nahin ho sakta par tera sath gawara bhi nahin ho sakta rasta bhi ghalat ho sakta hai manzil bhi ghalat har sitara to sitara bhi nahin ho sakta panw rakhte hi phisal sakta hai mitti ho ki ret har kinara to kinara bhi nahin ho sakta us tak aawaz pahunchni bhi badi mushkil hai aur na dekhe to ishaara bhi nahin ho sakta tere bandon ki maishat ka ajab haal hua aish kaisa ki guzara bhi nahin ho sakta apna dushman hi dikhai nahin deta ho jise aisa lashkar to saf-ara bhi nahin ho sakta pahle hi lazzat-e-inkar se waqif nahin jo us se inkar dobara bhi nahin ho sakta husn aisa ki chaka-chaund hui hain aankhen hairat aisi ki nazzara bhi nahin ho sakta chaliye wo shakhs hamara to kabhi tha hi nahin dukh to ye hai ki tumhaara bhi nahin ho sakta duniya achchhi bhi nahin lagti hum aison ko 'salim' aur duniya se kinara bhi nahin ho sakta
Related Ghazal
वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
244 likes
ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
232 likes
कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
435 likes
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
130 likes
किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
95 likes
More from Saleem Kausar
कहानी लिखते हुए दास्ताँ सुनाते हुए वो सो गया है मुझे ख़्वाब से जगाते हुए दिए की लौ से छलकता है उस के हुस्न का अक्स सिंगार करते हुए आईना सजाते हुए अब इस जगह से कई रास्ते निकलते हैं मैं गुम हुआ था जहाँ रास्ता बताते हुए पुकारते हैं उन्हें साहिलों के सन्नाटे जो लोग डूब गए कश्तियाँ बनाते हुए फिर उस ने मुझ से किसी बात को छुपाया नहीं वो खुल गया था किसी बात को छुपाते हुए मुझी में था वो सितारा-सिफ़त कि जिस के लिए मैं थक गया हूँ ज़माने की ख़ाक उड़ाते हुए मज़ारों और मुंडेरों के रत-जगों में 'सलीम' बदन पिघलने लगे हैं दिए जलाते हुए
Saleem Kausar
8 likes
मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है सर-ए-आईना मिरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है अजब ए'तिबार ओ बे-ए'तिबारी के दरमियान है ज़िंदगी मैं क़रीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है मिरी रौशनी तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है तुझे दुश्मनों की ख़बर न थी मुझे दोस्तों का पता नहीं तिरी दास्ताँ कोई और थी मिरा वाक़िआ' कोई और है वही मुंसिफ़ों की रिवायतें वही फ़ैसलों की इबारतें मिरा जुर्म तो कोई और था प मिरी सज़ा कोई और है कभी लौट आएँ तो पूछना नहीं देखना उन्हें ग़ौर से जिन्हें रास्ते में ख़बर हुई कि ये रास्ता कोई और है जो मिरी रियाज़त-ए-नीम-शब को 'सलीम' सुब्ह न मिल सकी तो फिर इस के मअ'नी तो ये हुए कि यहाँ ख़ुदा कोई और है
Saleem Kausar
7 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Saleem Kausar.
Similar Moods
More moods that pair well with Saleem Kausar's ghazal.







