ghazalKuch Alfaaz

कहानी लिखते हुए दास्ताँ सुनाते हुए वो सो गया है मुझे ख़्वाब से जगाते हुए दिए की लौ से छलकता है उस के हुस्न का अक्स सिंगार करते हुए आईना सजाते हुए अब इस जगह से कई रास्ते निकलते हैं मैं गुम हुआ था जहाँ रास्ता बताते हुए पुकारते हैं उन्हें साहिलों के सन्नाटे जो लोग डूब गए कश्तियाँ बनाते हुए फिर उस ने मुझ से किसी बात को छुपाया नहीं वो खुल गया था किसी बात को छुपाते हुए मुझी में था वो सितारा-सिफ़त कि जिस के लिए मैं थक गया हूँ ज़माने की ख़ाक उड़ाते हुए मज़ारों और मुंडेरों के रत-जगों में 'सलीम' बदन पिघलने लगे हैं दिए जलाते हुए

Related Ghazal

बस इक उसी पे तो पूरी तरह अयाॅं हूँ मैं वो कह रहा है मुझे रायगाॅं तो हाँ हूँ मैं जिसे दिखाई दूँ मेरी तरफ़ इशारा करे मुझे दिखाई नहीं दे रहा कहाॅं हूँ मैं इधर-उधर से नमी का रिसाव रहता है सड़क से नीचे बनाया गया मकाॅं हूँ मैं किसी ने पूछा कि तुम कौन हो तो भूल गया अभी किसी ने बताया तो था फ़लाॅं हूँ मैं मैं ख़ुद को तुझ से मिटाऊॅंगा एहतियात के साथ तू बस निशान लगा दे जहाॅं जहाॅं हूँ मैं मैं किस से पूछूॅं ये रस्ता दुरुस्त है कि ग़लत जहाॅं से कोई गुज़रता नहीं वहाॅं हूँ मैं

Umair Najmi

55 likes

वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढ़ता था जो इक नई दुनिया लौट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का

Javed Akhtar

62 likes

फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी

Kumar Vishwas

53 likes

सबने दिल से उसे उतारा था वो मरी कब थी उस को मारा था पैरों में गिरके जीता था जिस को उस को पाने में ख़ुद को हारा था तेरे मेरे में बट गया सब कुछ एक टाइम था सब हमारा था उस की यादों में दिल जले है अब जिस का चेहरा नहीं गवारा था मैं ने वो खोया जो मेरा नहीं था तुम ने वो खोया जो तुम्हारा था जीत सकता था उस सेे मैं कातिब पर बड़े हौसले से हारा था

Himanshi babra KATIB

43 likes

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं और क्या जुर्म है पता ही नहीं इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं ज़िंदगी मौत तेरी मंज़िल है दूसरा कोई रास्ता ही नहीं सच घटे या बढ़े तो सच न रहे झूट की कोई इंतिहा ही नहीं ज़िंदगी अब बता कहाँ जाएँ ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं जिस के कारन फ़साद होते हैं उस का कोई अता-पता ही नहीं कैसे अवतार कैसे पैग़मबर ऐसा लगता है अब ख़ुदा ही नहीं चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो आईना झूट बोलता ही नहीं अपनी रचनाओं में वो ज़िंदा है 'नूर' संसार से गया ही नहीं

Krishna Bihari Noor

37 likes

More from Saleem Kausar

मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है सर-ए-आईना मिरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है अजब ए'तिबार ओ बे-ए'तिबारी के दरमियान है ज़िंदगी मैं क़रीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है मिरी रौशनी तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है तुझे दुश्मनों की ख़बर न थी मुझे दोस्तों का पता नहीं तिरी दास्ताँ कोई और थी मिरा वाक़िआ' कोई और है वही मुंसिफ़ों की रिवायतें वही फ़ैसलों की इबारतें मिरा जुर्म तो कोई और था प मिरी सज़ा कोई और है कभी लौट आएँ तो पूछना नहीं देखना उन्हें ग़ौर से जिन्हें रास्ते में ख़बर हुई कि ये रास्ता कोई और है जो मिरी रियाज़त-ए-नीम-शब को 'सलीम' सुब्ह न मिल सकी तो फिर इस के मअ'नी तो ये हुए कि यहाँ ख़ुदा कोई और है

Saleem Kausar

7 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Saleem Kausar.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Saleem Kausar's ghazal.