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tum ko bhula rahi thi ki tum yaad aa gae main zahr kha rahi thi ki tum yaad aa gae kal meri ek pyari saheli kitab men ik khat chhupa rahi thi ki tum yaad aa gae us vaqt rat-rani mire suune sahn men khushbu luta rahi thi ki tum yaad aa gae iman janiye ki ise kufr janiye main sar jhuka rahi thi ki tum yaad aa gae kal shaam chhat pe mir-taqi-'mir' ki ghhazal main gunguna rahi thi ki tum yaad aa gae 'anjum' tumhara shahr jidhar hai usi taraf ik rail ja rahi thi ki tum yaad aa gae tum ko bhula rahi thi ki tum yaad aa gae main zahr kha rahi thi ki tum yaad aa gae kal meri ek pyari saheli kitab mein ek khat chhupa rahi thi ki tum yaad aa gae us waqt raat-rani mere sune sahn mein khushbu luta rahi thi ki tum yaad aa gae iman jaaniye ki ise kufr jaaniye main sar jhuka rahi thi ki tum yaad aa gae kal sham chhat pe mir-taqi-'mir' ki ghazal main gunguna rahi thi ki tum yaad aa gae 'anjum' tumhaara shahr jidhar hai usi taraf ek rail ja rahi thi ki tum yaad aa gae

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो

Himanshi babra KATIB

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए मैं ज़हर खा रही थी कि तुम याद आ गए कल मेरी एक प्यारी सहेली किताब में इक ख़त छुपा रही थी कि तुम याद आ गए उस वक़्त रात-रानी मिरे सूने सहन में ख़ुशबू लुटा रही थी कि तुम याद आ गए ईमान जानिए कि इसे कुफ़्र जानिए मैं सर झुका रही थी कि तुम याद आ गए कल शाम छत पे मीर-तक़ी-'मीर'' की ग़ज़ल मैं गुनगुना रही थी कि तुम याद आ गए 'अंजुम' तुम्हारा शहर जिधर है उसी तरफ़ इक रेल जा रही थी कि तुम याद आ गए

Anjum Rehbar

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मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था मैं उस को देखने को तरसती ही रह गई जिस शख़्स की हथेली पे मेरा नसीब था बस्ती के सारे लोग ही आतिश-परस्त थे घर जल रहा था और समुंदर क़रीब था मरियम कहाँ तलाश करे अपने ख़ून को हर शख़्स के गले में निशान-ए-सलीब था दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में मैं जिस को चाहती थी वो लड़का ग़रीब था

Anjum Rehbar

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जिन के आँगन में अमीरी का शजर लगता है  उन का हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है  चाँद तारे मिरे क़दमों में बिछे जाते हैं  ये बुज़ुर्गों की दु'आओं का असर लगता है  माँ मुझे देख के नाराज़ न हो जाए कहीं  सर पे आँचल नहीं होता है तो डर लगता है

Anjum Rehbar

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