ujla tira bartan hai aur saaf tira paani ik umr ka pyasa huun mujh ko bhi pila paani hai ik khat-e-nadida dariya-e-mohabbat men hota hai jahan aa kar paani se juda paani donon hi to sachche the ilzam kise dete kanon ne kaha sahra ankhon ne suna paani kya kya na mili mitti kya kya na dhuan phaila kaala na hua sabza maila na hua paani jab shaam utarti hai kya dil pe guzarti hai sahil ne bahut puchha khamosh raha paani phir dekh ki ye duniya kaisi nazar aati hai 'mushtaq' mai-e-ghham men thoda sa mila paani ujla tera bartan hai aur saf tera pani ek umr ka pyasa hun mujh ko bhi pila pani hai ek khat-e-nadida dariya-e-mohabbat mein hota hai jahan aa kar pani se juda pani donon hi to sachche the ilzam kise dete kanon ne kaha sahra aankhon ne suna pani kya kya na mili mitti kya kya na dhuan phaila kala na hua sabza maila na hua pani jab sham utarti hai kya dil pe guzarti hai sahil ne bahut puchha khamosh raha pani phir dekh ki ye duniya kaisi nazar aati hai 'mushtaq' mai-e-gham mein thoda sa mila pani
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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हाथ से नापता हूँ दर्द की गहराई को ये नया खेल मिला है मेरी तन्हाई को था जो सीने में चराग़-ए-दिल-पुर-ख़ूँ न रहा चाटिए बैठ के अब सब्र-ओ-शकेबाई को दिल-ए-अफ़सुर्दा किसी तरह बहलता ही नहीं क्या करें आप की इस हौसला-अफ़ज़ाई को ख़ैर बदनाम तो पहले भी बहुत थे लेकिन तुझ से मिलना था कि पर लग गए रुस्वाई को निगह-ए-नाज़ न मिलते हुए घबरा हम से हम मोहब्बत नहीं कहने के शनासाई को दिल है नैरंगी-ए-अय्याम पे हैराँ अब तक इतनी सी बात भी मालूम नहीं भाई को
Ahmad Mushtaq
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ख़ून-ए-दिल से किश्त-ए-ग़म को सींचता रहता हूँ मैं ख़ाली काग़ज़ पर लकीरें खींचता रहता हूँ मैं आज से मुझ पर मुकम्मल हो गया दीन-ए-फ़िराक़ हाँ तसव्वुर में भी अब तुझ से जुदा रहता हूँ मैं तू दयार-ए-हुस्न है ऊँची रहे तेरी फ़सील मैं हूँ दरवाज़ा मोहब्बत का, खुला रहता हूँ मैं शाम तक खींचे लिए फिरते हैं इस दुनिया के काम सुब्ह तक फ़र्श-ए-नदामत पर पड़ा रहता हूँ मैं हाँ कभी मुझ पर भी हो जाता है मौसम का असर हाँ किसी दिन शाकी-ए-आब-ओ-हवा रहता हूँ मैं अहल-ए-दुनिया से तअ'ल्लुक़ क़त्अ होता ही नहीं भूल जाने पर भी सूरत-आश्ना रहता हूँ मैं
Ahmad Mushtaq
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किस झुट-पुटे के रंग उजालों में आ गए टुकड़े शफ़क़ के धूप से गालों में आ गए अफ़्सुर्दगी की लय भी तिरे क़हक़हों में थी पतझड़ के सुर बहार के झालों में आ गए उड़ कर कहाँ कहाँ से परिंदों के क़ाफ़िले नादीदा पानियों के ख़यालों में आ गए हुस्न-ए-तमाम थे तो कोई देखता न था तुम दर्द बन के देखने वालों में आ गए काँटे समझ के घास पे चलता रहा हूँ मैं क़तरे तमाम ओस के छालों में आ गए कुछ रत-जगे थे जिन की ज़रूरत नहीं रही कुछ ख़्वाब थे जो मेरे ख़यालों में आ गए
Ahmad Mushtaq
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इश्क़ में कौन बता सकता है किस ने किस से सच बोला है हम तुम साथ हैं इस लम्हे में दुख सुख तो अपना अपना है मुझ को तो सारे नामों में तेरा नाम अच्छा लगता है भूल गई वो शक्ल भी आख़िर कब तक याद कोई रहता है
Ahmad Mushtaq
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तुम आए हो तुम्हें भी आज़मा कर देख लेता हूँ तुम्हारे साथ भी कुछ दूर जा कर देख लेता हूँ हवाएँ जिन की अंधी खिड़कियों पर सर पटकती हैं मैं उन कमरों में फिर शमएँ जला कर देख लेता हूँ अजब क्या इस क़रीने से कोई सूरत निकल आए तिरी बातों को ख़्वाबों से मिला कर देख लेता हूँ सहर-ए-दम किर्चियाँ टूटे हुए ख़्वाबों की मिलती हैं तो बिस्तर झाड़ कर चादर हटा कर देख लेता हूँ बहुत दिल को दुखाता है कभी जब दर्द-ए-महजूरी तिरी यादों की जानिब मुस्कुरा कर देख लेता हूँ उड़ा कर रंग कुछ होंटों से कुछ आँखों से कुछ दिल से गए लम्हों को तस्वीरें बना कर देख लेता हूँ नहीं हो तुम भी वो अब मुझ से यारो क्या छुपाओगे हवा की सम्त को मिट्टी उड़ा कर देख लेता हूँ सुना है बे-नियाज़ी ही इलाज-ए-ना-उमीदी है ये नुस्ख़ा भी कोई दिन आज़मा कर देख लेता हूँ मोहब्बत मर गई 'मुश्ताक़' लेकिन तुम न मानोगे मैं ये अफ़्वाह भी तुम को सुना कर देख लेता हूँ
Ahmad Mushtaq
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