ghazalKuch Alfaaz

वो चाँद सा इक चेहरा सोने पे सुहागा है और उस पे है तिल काला सोने पे सुहागा है कुछ फ़र्क़ पड़ा उस पर बदली न रविश उस की दीवाना है और सहरा सोने पे सुहागा है बेहाल परीशाँ हूँ दुनिया का हूँ ठुकराया और मुझ पे तिरा हँसना सोने पे सुहागा है भाई की कलाई पर बाँधा है जो बहनों ने हाँ प्यार का ये धागा सोने पे सुहागा है वो जब भी कभी बोलें मोती से बरसते हैं और जादू भरा लहजा सोने पे सुहागा है है नाम तिरा लब पर आँखों में तिरी सूरत और सर पे तिरा साया सोने पे सुहागा है शीरीनी है लज़्ज़त है हर लफ़्ज़ अनोखा है ये उर्दू ज़बां भी क्या सोने पे सुहागा है ता'रीफ़ मैं कर पाऊँ किस तरह भला काशिफ़ वो शख़्स ही सरमाया सोने पे सुहागा है

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दो नावों पर पाँव पसारे ऐसे कैसे वो भी प्यारा हम भी प्यारे ऐसे कैसे सूरज बोला बिन मेरे दुनिया अंधी है हँस कर बोले चाँद सितारे ऐसे कैसे तेरे हिस्से की ख़ुशियों से बैर नहीं पर मेरे हक़ में सिर्फ़ ख़सारे ऐसे कैसे गालों पर बोसा दे कर जब चली गई वो कहते रह गए होंठ बिचारे ऐसे कैसे मुझ जैसों को यां पर देख के कहते हैं वो इतना आगे बिना सहारे ऐसे कैसे जैसे ही मक़्ते पर पहुँची ग़ज़ल असद की बोल उठे सारे के सारे ऐसे कैसे

Asad Akbarabadi

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बड़े तहम्मुल से रफ़्ता रफ़्ता निकालना है बचा है जो तुझ में मेरा हिस्सा निकालना है ये रूह बरसों से दफ़्न है तुम मदद करोगे बदन के मलबे से इस को ज़िंदा निकालना है नज़र में रखना कहीं कोई ग़म-शनास गाहक मुझे सुख़न बेचना है ख़र्चा निकालना है निकाल लाया हूँ एक पिंजरे से इक परिंदा अब इस परिंदे के दिल से पिंजरा निकालना है ये तीस बरसों से कुछ बरस पीछे चल रही है मुझे घड़ी का ख़राब पुर्ज़ा निकालना है ख़याल है ख़ानदान को इत्तिलाअ' दे दूँ जो कट गया उस शजर का शजरा निकालना है मैं एक किरदार से बड़ा तंग हूँ क़लमकार मुझे कहानी में डाल ग़ुस्सा निकालना है

Umair Najmi

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बड़े तहम्मुल से रफ़्ता रफ़्ता निकालना है बचा है जो तुझ में मेरा हिस्सा निकालना है ये रूह बरसों से दफ़्न है तुम मदद करोगे बदन के मलबे से इस को ज़िंदा निकालना है नज़र में रखना कहीं कोई ग़म-शनास गाहक मुझे सुख़न बेचना है ख़र्चा निकालना है निकाल लाया हूँ एक पिंजरे से इक परिंदा अब इस परिंदे के दिल से पिंजरा निकालना है ये तीस बरसों से कुछ बरस पीछे चल रही है मुझे घड़ी का ख़राब पुर्ज़ा निकालना है ख़याल है ख़ानदान को इत्तिलाअ' दे दूँ जो कट गया उस शजर का शजरा निकालना है मैं एक किरदार से बड़ा तंग हूँ क़लमकार मुझे कहानी में डाल ग़ुस्सा निकालना है

Umair Najmi

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वो ग़ज़ल वालों का उस्लूब समझते होंगे चाँद कहते हैं किसे ख़ूब समझते होंगे इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे मैं समझता था मोहब्बत की ज़बाँ ख़ुशबू है फूल से लोग उसे ख़ूब समझते होंगे देख कर फूल के औराक़ पे शबनम कुछ लोग तिरा अश्कों भरा मक्तूब समझते होंगे भूल कर अपना ज़माना ये ज़माने वाले आज के प्यार को मायूब समझते होंगे

Bashir Badr

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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हर इक बुरी नज़र से बचा कीजिए हुज़ूर दिल में हमारे आप रहा कीजिए हुज़ूर काटें हम एक साथ सज़ा जिस की उम्र भर ऐसी कोई हसीन ख़ता कीजिए हुज़ूर पेचीदा मोड़ इश्क़ में आगे भी आएँगे यूँँ बात बात पर न डरा कीजिए हुज़ूर इन की नसीहतें किसी नेमत से कम नहीं कोई बड़ा कहे तो सुना कीजिए हुज़ूर इल्ज़ाम बे वफ़ाई का और मेरी ज़ात पर इस बात पर ज़रा तो हया कीजिए हुज़ूर अब अनक़रीब है मेरी क़िस्मत का फ़ैसला अब आप मेरे हक़ में दुआ कीजिए हुज़ूर पहली सी क्यूँँ दिलों में मोहब्बत नहीं रही इस बात का ख़ुद आप पता कीजिए हुज़ूर काशिफ़ को भी ख़ुमारे मोहब्बत की है तलाश बस एक जा में इश्क़ अता कीजिए हुज़ूर

Kashif Adeeb Makanpuri

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परिंदे जिस तरह से आबो दाना ढूँढ़ लेते हैं जो हैं ख़ाना बदोश अपना ठिकाना ढूँढ़ लेते हैं तुम अपने दिल पे रख के हाथ छुप जाओ तो क्या होगा जो तीर अन्दाज़ हैं अपना निशाना ढूँढ़ लेते हैं हमारे अश्क तो बर्बाद होंगे ख़ाक पे गिर के वो रोने के लिए भी कोई शाना ढूँढ़ लेते हैं बुरा क्या है अगर हम मस्त हैं अपनी फ़क़ीरी में जो ऊंचे लोग हैं ऊंचा घराना ढूँढ़ लेते हैं मोहब्बत से जो अक्सर चूमते हैं माँ के क़दमों को वो दुनिया ही में जन्नत का ख़ज़ाना ढूँढ़ लेते हैं हज़ारों ग़म हैं दिल में आँख में अश्कों का दरिया है मगर हँसने का हम फिर भी बहाना ढूँढ़ लेते हैं हैं हर जानिब मनाज़िर नफ़रतों के फिर भी ऐ काशिफ़ हम अहले दिल मोहब्बत का तराना ढूँढ़ लेते हैं

Kashif Adeeb Makanpuri

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देखिए मायूस चेहरे पर हँसी की हाज़िरी दिल में जब हो जाए धोके से ख़ुशी की हाज़िरी अब ख़ुदा जाने कि हो अन्जाम क्या नादान का शाख़ पर है फूल की सूरत कली की हाज़िरी कैसे लफ़्ज़ों में बयाँ हो पाए ये मन्ज़र हसीं आस्मा पर चाँद घर में चाँदनी की हाज़िरी एक तो आँखें मुशर्रफ़ होंगी उन की दीद से और हो जाएगी ऐसे हाज़िरी की हाज़िरी करते हैं दो प्यार करने वाले जब आपस में बात अच्छी लगती है कहाँ उस दम किसी की हाज़िरी उस गली में कोई मुझ को जानने वाला नहीं मुद्दतों मैं ने लगाई जिस गली की हाज़िरी बा अदब हो कर खड़े हैं हाज़िरे दरबार सब ज़िंदगानी ले रही है अब सभी की हाज़िरी उस हसीं चेहरे का ही फ़ैज़ान है काशिफ़ अदीब ज़ेहन में होने लगी है शा'इरी की हाज़िरी

Kashif Adeeb Makanpuri

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