हर इक बुरी नज़र से बचा कीजिए हुज़ूर दिल में हमारे आप रहा कीजिए हुज़ूर काटें हम एक साथ सज़ा जिस की उम्र भर ऐसी कोई हसीन ख़ता कीजिए हुज़ूर पेचीदा मोड़ इश्क़ में आगे भी आएँगे यूँँ बात बात पर न डरा कीजिए हुज़ूर इन की नसीहतें किसी नेमत से कम नहीं कोई बड़ा कहे तो सुना कीजिए हुज़ूर इल्ज़ाम बे वफ़ाई का और मेरी ज़ात पर इस बात पर ज़रा तो हया कीजिए हुज़ूर अब अनक़रीब है मेरी क़िस्मत का फ़ैसला अब आप मेरे हक़ में दुआ कीजिए हुज़ूर पहली सी क्यूँँ दिलों में मोहब्बत नहीं रही इस बात का ख़ुद आप पता कीजिए हुज़ूर काशिफ़ को भी ख़ुमारे मोहब्बत की है तलाश बस एक जा में इश्क़ अता कीजिए हुज़ूर
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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी
Ali Zaryoun
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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आप जैसों के लिए इस में रखा कुछ भी नहीं लेकिन ऐसा तो न कहिए कि वफ़ा कुछ भी नहीं आप कहिए तो निभाते चले जाएँगे मगर इस तअ'ल्लुक़ में अज़िय्यत के सिवा कुछ भी नहीं मैं किसी तरह भी समझौता नहीं कर सकता या तो सब कुछ ही मुझे चाहिए या कुछ भी नहीं कैसे जाना है कहाँ जाना है क्यूँँ जाना है हम कि चलते चले जाते हैं पता कुछ भी नहीं हाए इस शहर की रौनक़ के मैं सदक़े जाऊँ ऐसी भरपूर है जैसे कि हुआ कुछ भी नहीं फिर कोई ताज़ा सुख़न दिल में जगह करता है जब भी लगता है कि लिखने को बचा कुछ भी नहीं अब मैं क्या अपनी मोहब्बत का भरम भी न रखूँ मान लेता हूँ कि उस शख़्स में था कुछ भी नहीं मैं ने दुनिया से अलग रह के भी देखा 'जव्वाद' ऐसी मुँह-ज़ोर उदासी की दवा कुछ भी नहीं
Jawwad Sheikh
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परिंदे जिस तरह से आबो दाना ढूँढ़ लेते हैं जो हैं ख़ाना बदोश अपना ठिकाना ढूँढ़ लेते हैं तुम अपने दिल पे रख के हाथ छुप जाओ तो क्या होगा जो तीर अन्दाज़ हैं अपना निशाना ढूँढ़ लेते हैं हमारे अश्क तो बर्बाद होंगे ख़ाक पे गिर के वो रोने के लिए भी कोई शाना ढूँढ़ लेते हैं बुरा क्या है अगर हम मस्त हैं अपनी फ़क़ीरी में जो ऊंचे लोग हैं ऊंचा घराना ढूँढ़ लेते हैं मोहब्बत से जो अक्सर चूमते हैं माँ के क़दमों को वो दुनिया ही में जन्नत का ख़ज़ाना ढूँढ़ लेते हैं हज़ारों ग़म हैं दिल में आँख में अश्कों का दरिया है मगर हँसने का हम फिर भी बहाना ढूँढ़ लेते हैं हैं हर जानिब मनाज़िर नफ़रतों के फिर भी ऐ काशिफ़ हम अहले दिल मोहब्बत का तराना ढूँढ़ लेते हैं
Kashif Adeeb Makanpuri
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वो चाँद सा इक चेहरा सोने पे सुहागा है और उस पे है तिल काला सोने पे सुहागा है कुछ फ़र्क़ पड़ा उस पर बदली न रविश उस की दीवाना है और सहरा सोने पे सुहागा है बेहाल परीशाँ हूँ दुनिया का हूँ ठुकराया और मुझ पे तिरा हँसना सोने पे सुहागा है भाई की कलाई पर बाँधा है जो बहनों ने हाँ प्यार का ये धागा सोने पे सुहागा है वो जब भी कभी बोलें मोती से बरसते हैं और जादू भरा लहजा सोने पे सुहागा है है नाम तिरा लब पर आँखों में तिरी सूरत और सर पे तिरा साया सोने पे सुहागा है शीरीनी है लज़्ज़त है हर लफ़्ज़ अनोखा है ये उर्दू ज़बां भी क्या सोने पे सुहागा है ता'रीफ़ मैं कर पाऊँ किस तरह भला काशिफ़ वो शख़्स ही सरमाया सोने पे सुहागा है
Kashif Adeeb Makanpuri
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देखिए मायूस चेहरे पर हँसी की हाज़िरी दिल में जब हो जाए धोके से ख़ुशी की हाज़िरी अब ख़ुदा जाने कि हो अन्जाम क्या नादान का शाख़ पर है फूल की सूरत कली की हाज़िरी कैसे लफ़्ज़ों में बयाँ हो पाए ये मन्ज़र हसीं आस्मा पर चाँद घर में चाँदनी की हाज़िरी एक तो आँखें मुशर्रफ़ होंगी उन की दीद से और हो जाएगी ऐसे हाज़िरी की हाज़िरी करते हैं दो प्यार करने वाले जब आपस में बात अच्छी लगती है कहाँ उस दम किसी की हाज़िरी उस गली में कोई मुझ को जानने वाला नहीं मुद्दतों मैं ने लगाई जिस गली की हाज़िरी बा अदब हो कर खड़े हैं हाज़िरे दरबार सब ज़िंदगानी ले रही है अब सभी की हाज़िरी उस हसीं चेहरे का ही फ़ैज़ान है काशिफ़ अदीब ज़ेहन में होने लगी है शा'इरी की हाज़िरी
Kashif Adeeb Makanpuri
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