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परिंदे जिस तरह से आबो दाना ढूँढ़ लेते हैं जो हैं ख़ाना बदोश अपना ठिकाना ढूँढ़ लेते हैं तुम अपने दिल पे रख के हाथ छुप जाओ तो क्या होगा जो तीर अन्दाज़ हैं अपना निशाना ढूँढ़ लेते हैं हमारे अश्क तो बर्बाद होंगे ख़ाक पे गिर के वो रोने के लिए भी कोई शाना ढूँढ़ लेते हैं बुरा क्या है अगर हम मस्त हैं अपनी फ़क़ीरी में जो ऊंचे लोग हैं ऊंचा घराना ढूँढ़ लेते हैं मोहब्बत से जो अक्सर चूमते हैं माँ के क़दमों को वो दुनिया ही में जन्नत का ख़ज़ाना ढूँढ़ लेते हैं हज़ारों ग़म हैं दिल में आँख में अश्कों का दरिया है मगर हँसने का हम फिर भी बहाना ढूँढ़ लेते हैं हैं हर जानिब मनाज़िर नफ़रतों के फिर भी ऐ काशिफ़ हम अहले दिल मोहब्बत का तराना ढूँढ़ लेते हैं

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी

Zubair Ali Tabish

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हर इक बुरी नज़र से बचा कीजिए हुज़ूर दिल में हमारे आप रहा कीजिए हुज़ूर काटें हम एक साथ सज़ा जिस की उम्र भर ऐसी कोई हसीन ख़ता कीजिए हुज़ूर पेचीदा मोड़ इश्क़ में आगे भी आएँगे यूँँ बात बात पर न डरा कीजिए हुज़ूर इन की नसीहतें किसी नेमत से कम नहीं कोई बड़ा कहे तो सुना कीजिए हुज़ूर इल्ज़ाम बे वफ़ाई का और मेरी ज़ात पर इस बात पर ज़रा तो हया कीजिए हुज़ूर अब अनक़रीब है मेरी क़िस्मत का फ़ैसला अब आप मेरे हक़ में दुआ कीजिए हुज़ूर पहली सी क्यूँँ दिलों में मोहब्बत नहीं रही इस बात का ख़ुद आप पता कीजिए हुज़ूर काशिफ़ को भी ख़ुमारे मोहब्बत की है तलाश बस एक जा में इश्क़ अता कीजिए हुज़ूर

Kashif Adeeb Makanpuri

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देखिए मायूस चेहरे पर हँसी की हाज़िरी दिल में जब हो जाए धोके से ख़ुशी की हाज़िरी अब ख़ुदा जाने कि हो अन्जाम क्या नादान का शाख़ पर है फूल की सूरत कली की हाज़िरी कैसे लफ़्ज़ों में बयाँ हो पाए ये मन्ज़र हसीं आस्मा पर चाँद घर में चाँदनी की हाज़िरी एक तो आँखें मुशर्रफ़ होंगी उन की दीद से और हो जाएगी ऐसे हाज़िरी की हाज़िरी करते हैं दो प्यार करने वाले जब आपस में बात अच्छी लगती है कहाँ उस दम किसी की हाज़िरी उस गली में कोई मुझ को जानने वाला नहीं मुद्दतों मैं ने लगाई जिस गली की हाज़िरी बा अदब हो कर खड़े हैं हाज़िरे दरबार सब ज़िंदगानी ले रही है अब सभी की हाज़िरी उस हसीं चेहरे का ही फ़ैज़ान है काशिफ़ अदीब ज़ेहन में होने लगी है शा'इरी की हाज़िरी

Kashif Adeeb Makanpuri

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वो चाँद सा इक चेहरा सोने पे सुहागा है और उस पे है तिल काला सोने पे सुहागा है कुछ फ़र्क़ पड़ा उस पर बदली न रविश उस की दीवाना है और सहरा सोने पे सुहागा है बेहाल परीशाँ हूँ दुनिया का हूँ ठुकराया और मुझ पे तिरा हँसना सोने पे सुहागा है भाई की कलाई पर बाँधा है जो बहनों ने हाँ प्यार का ये धागा सोने पे सुहागा है वो जब भी कभी बोलें मोती से बरसते हैं और जादू भरा लहजा सोने पे सुहागा है है नाम तिरा लब पर आँखों में तिरी सूरत और सर पे तिरा साया सोने पे सुहागा है शीरीनी है लज़्ज़त है हर लफ़्ज़ अनोखा है ये उर्दू ज़बां भी क्या सोने पे सुहागा है ता'रीफ़ मैं कर पाऊँ किस तरह भला काशिफ़ वो शख़्स ही सरमाया सोने पे सुहागा है

Kashif Adeeb Makanpuri

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