ghazalKuch Alfaaz

देखिए मायूस चेहरे पर हँसी की हाज़िरी दिल में जब हो जाए धोके से ख़ुशी की हाज़िरी अब ख़ुदा जाने कि हो अन्जाम क्या नादान का शाख़ पर है फूल की सूरत कली की हाज़िरी कैसे लफ़्ज़ों में बयाँ हो पाए ये मन्ज़र हसीं आस्मा पर चाँद घर में चाँदनी की हाज़िरी एक तो आँखें मुशर्रफ़ होंगी उन की दीद से और हो जाएगी ऐसे हाज़िरी की हाज़िरी करते हैं दो प्यार करने वाले जब आपस में बात अच्छी लगती है कहाँ उस दम किसी की हाज़िरी उस गली में कोई मुझ को जानने वाला नहीं मुद्दतों मैं ने लगाई जिस गली की हाज़िरी बा अदब हो कर खड़े हैं हाज़िरे दरबार सब ज़िंदगानी ले रही है अब सभी की हाज़िरी उस हसीं चेहरे का ही फ़ैज़ान है काशिफ़ अदीब ज़ेहन में होने लगी है शा'इरी की हाज़िरी

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है

Ali Zaryoun

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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हर इक बुरी नज़र से बचा कीजिए हुज़ूर दिल में हमारे आप रहा कीजिए हुज़ूर काटें हम एक साथ सज़ा जिस की उम्र भर ऐसी कोई हसीन ख़ता कीजिए हुज़ूर पेचीदा मोड़ इश्क़ में आगे भी आएँगे यूँँ बात बात पर न डरा कीजिए हुज़ूर इन की नसीहतें किसी नेमत से कम नहीं कोई बड़ा कहे तो सुना कीजिए हुज़ूर इल्ज़ाम बे वफ़ाई का और मेरी ज़ात पर इस बात पर ज़रा तो हया कीजिए हुज़ूर अब अनक़रीब है मेरी क़िस्मत का फ़ैसला अब आप मेरे हक़ में दुआ कीजिए हुज़ूर पहली सी क्यूँँ दिलों में मोहब्बत नहीं रही इस बात का ख़ुद आप पता कीजिए हुज़ूर काशिफ़ को भी ख़ुमारे मोहब्बत की है तलाश बस एक जा में इश्क़ अता कीजिए हुज़ूर

Kashif Adeeb Makanpuri

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परिंदे जिस तरह से आबो दाना ढूँढ़ लेते हैं जो हैं ख़ाना बदोश अपना ठिकाना ढूँढ़ लेते हैं तुम अपने दिल पे रख के हाथ छुप जाओ तो क्या होगा जो तीर अन्दाज़ हैं अपना निशाना ढूँढ़ लेते हैं हमारे अश्क तो बर्बाद होंगे ख़ाक पे गिर के वो रोने के लिए भी कोई शाना ढूँढ़ लेते हैं बुरा क्या है अगर हम मस्त हैं अपनी फ़क़ीरी में जो ऊंचे लोग हैं ऊंचा घराना ढूँढ़ लेते हैं मोहब्बत से जो अक्सर चूमते हैं माँ के क़दमों को वो दुनिया ही में जन्नत का ख़ज़ाना ढूँढ़ लेते हैं हज़ारों ग़म हैं दिल में आँख में अश्कों का दरिया है मगर हँसने का हम फिर भी बहाना ढूँढ़ लेते हैं हैं हर जानिब मनाज़िर नफ़रतों के फिर भी ऐ काशिफ़ हम अहले दिल मोहब्बत का तराना ढूँढ़ लेते हैं

Kashif Adeeb Makanpuri

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वो चाँद सा इक चेहरा सोने पे सुहागा है और उस पे है तिल काला सोने पे सुहागा है कुछ फ़र्क़ पड़ा उस पर बदली न रविश उस की दीवाना है और सहरा सोने पे सुहागा है बेहाल परीशाँ हूँ दुनिया का हूँ ठुकराया और मुझ पे तिरा हँसना सोने पे सुहागा है भाई की कलाई पर बाँधा है जो बहनों ने हाँ प्यार का ये धागा सोने पे सुहागा है वो जब भी कभी बोलें मोती से बरसते हैं और जादू भरा लहजा सोने पे सुहागा है है नाम तिरा लब पर आँखों में तिरी सूरत और सर पे तिरा साया सोने पे सुहागा है शीरीनी है लज़्ज़त है हर लफ़्ज़ अनोखा है ये उर्दू ज़बां भी क्या सोने पे सुहागा है ता'रीफ़ मैं कर पाऊँ किस तरह भला काशिफ़ वो शख़्स ही सरमाया सोने पे सुहागा है

Kashif Adeeb Makanpuri

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