ghazalKuch Alfaaz

vo ham-safar tha magar us se ham-navai na thi ki dhuup chhanv ka aalam raha judai na thi na apna ranj na auron ka dukh na tera malal shab-e-firaq kabhi ham ne yuun ganvai na thi mohabbaton ka safar is tarah bhi guzra tha shikasta-dil the musafir shikasta-pai na thi adavaten thin, taghhaful thaa, ranjishen thiin bahut bichhadne vaale men sab kuchh thaa, bevafai na thi bichhadte vaqt un ankhon men thi hamari ghhazal ghhazal bhi vo jo kisi ko abhi sunai na thi kise pukar raha tha vo dubta hua din sada to aai thi lekin koi duhai na thi kabhi ye haal ki donon men yak-dili thi bahut kabhi ye marhala jaise ki ashnai na thi ajiib hoti hai rah-e-sukhan bhi dekh 'nasir' vahan bhi aa gae akhir, jahan rasai na thi wo ham-safar tha magar us se ham-nawai na thi ki dhup chhanw ka aalam raha judai na thi na apna ranj na auron ka dukh na tera malal shab-e-firaq kabhi hum ne yun ganwai na thi mohabbaton ka safar is tarah bhi guzra tha shikasta-dil the musafir shikasta-pai na thi adawaten thin, taghaful tha, ranjishen thin bahut bichhadne wale mein sab kuchh tha, bewafai na thi bichhadte waqt un aankhon mein thi hamari ghazal ghazal bhi wo jo kisi ko abhi sunai na thi kise pukar raha tha wo dubta hua din sada to aai thi lekin koi duhai na thi kabhi ye haal ki donon mein yak-dili thi bahut kabhi ye marhala jaise ki aashnai na thi ajib hoti hai rah-e-sukhan bhi dekh 'nasir' wahan bhi aa gae aakhir, jahan rasai na thi

Related Ghazal

पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

96 likes

बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

196 likes

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

435 likes

इस तरह से न आज़माओ मुझे उस की तस्वीर मत दिखाओ मुझे ऐन मुमकिन है मैं पलट आऊँ उस की आवाज़ में बुलाओ मुझे मैं ने बोला था याद मत आना झूठ बोला था याद आओ मुझे

Ali Zaryoun

64 likes

More from Naseer Turabi

वो हम-सफ़र था मगर उस से हम-नवाई न थी कि धूप छाँव का आलम रहा जुदाई न थी न अपना रंज न औरों का दुख न तेरा मलाल शब-ए-फ़िराक़ कभी हम ने यूँँ गँवाई न थी मोहब्बतों का सफ़र इस तरह भी गुज़रा था शिकस्ता-दिल थे मुसाफ़िर शिकस्ता-पाई न थी अदावतें थीं तग़ाफ़ुल था रंजिशें थीं बहुत बिछड़ने वाले में सब कुछ था बे-वफ़ाई न थी बिछड़ते वक़्त उन आँखों में थी हमारी ग़ज़ल ग़ज़ल भी वो जो किसी को अभी सुनाई न थी किसे पुकार रहा था वो डूबता हुआ दिन सदा तो आई थी लेकिन कोई दुहाई न थी कभी ये हाल कि दोनों में यक-दिली थी बहुत कभी ये मरहला जैसे कि आशनाई न थी अजीब होती है राह-ए-सुख़न भी देख 'नसीर' वहाँ भी आ गए आख़िर जहाँ रसाई न थी

Naseer Turabi

18 likes

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Naseer Turabi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Naseer Turabi's ghazal.