ghazalKuch Alfaaz

वो हम-सफ़र था मगर उस से हम-नवाई न थी कि धूप छाँव का आलम रहा जुदाई न थी न अपना रंज न औरों का दुख न तेरा मलाल शब-ए-फ़िराक़ कभी हम ने यूँँ गँवाई न थी मोहब्बतों का सफ़र इस तरह भी गुज़रा था शिकस्ता-दिल थे मुसाफ़िर शिकस्ता-पाई न थी अदावतें थीं तग़ाफ़ुल था रंजिशें थीं बहुत बिछड़ने वाले में सब कुछ था बे-वफ़ाई न थी बिछड़ते वक़्त उन आँखों में थी हमारी ग़ज़ल ग़ज़ल भी वो जो किसी को अभी सुनाई न थी किसे पुकार रहा था वो डूबता हुआ दिन सदा तो आई थी लेकिन कोई दुहाई न थी कभी ये हाल कि दोनों में यक-दिली थी बहुत कभी ये मरहला जैसे कि आशनाई न थी अजीब होती है राह-ए-सुख़न भी देख 'नसीर' वहाँ भी आ गए आख़िर जहाँ रसाई न थी

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चल दिए फेर कर नज़र तुम भी ग़ैर तो ग़ैर थे मगर तुम भी ये गली मेरे दिलरुबा की है दोस्तों ख़ैरियत इधर तुम भी मुझ पे लोगों के साथ हँसते हो लोग रोएँगे ख़ास कर तुम भी मुझ को ठुकरा दिया है दुनिया ने मैं तो मर जाऊँगा अगर तुम भी उस की गाड़ी तो जा चुकी 'ताबिश' अब उठो जाओ अपने घर तुम भी

Zubair Ali Tabish

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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ये किस तरह का तअल्लुक़ है आप का मेरे साथ मुझे ही छोड़ के जाने का मशवरा मेरे साथ यही कहीं हमें रस्तों ने बद-दुआ दी थी मगर मैं भुल गया और कौन था मेरे साथ वो झांकता नहीं खिड़की से दिन निकलता है तुझे यक़ीन नहीं आ रहा तो आ मेरे साथ

Tehzeeb Hafi

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शर्मिंदगी है हम को बहुत हम मिले तुम्हें तुम सर-ब-सर ख़ुशी थे मगर ग़म मिले तुम्हें मैं अपने आप में न मिला इस का ग़म नहीं ग़म तो ये है कि तुम भी बहुत कम मिले तुम्हें तुम को जहान-ए-शौक़-ओ-तमन्ना में क्या मिला हम भी मिले तो दरहम ओ बरहम मिले तुम्हें यूँँ हो कि और ही कोई हव्वा मिले मुझे हो यूँँ कि और ही कोई आदम मिले तुम्हें

Jaun Elia

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ये किस तरह का तअ'ल्लुक़ है आप का मेरे साथ मुझे ही छोड़ के जाने का मशवरा मेरे साथ यही कहीं हमें रस्तों ने बद-दुआ दी थी मगर मैं भूल गया और कौन था मेरे साथ वो झाँकता नहीं खिड़की से दिन निकलता है तुझे यक़ीन नहीं आ रहा तो आ मेरे साथ

Tehzeeb Hafi

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