ghazalKuch Alfaaz

ये कैसे सानहे अब पेश आने लग गए हैं तेरे आग़ोश में हम छट-पटाने लग गए हैं बहुत मुमकिन है कोई तीर हम को आ लगेगा हम ऐसे लोग जो पंछी उड़ाने लग गए हैं हमारे बिन भला तन्हाई घर में क्या ही करती उसे भी साथ ही ऑफ़िस में लाने लग गए हैं बदन पर याद की बारिश के छींटे पड़ गए थे पराई धूप में उन को सुखाने लग गए हैं हवा के एक ही झोंके में ये फल गिर पड़ेंगे ये बूढे पेड़ के कंधे झुकाने लग गए हैं नज़र के चौक पे बारिश झमाझम गिर रही है तो दिल के रूम में गाने पुराने लग गए हैं

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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कौन निकले घर से बाहर रात में सो गए हम अपने अंदर रात में फिर से मिलने आ गईं तन्हाइयाँ क्यूँ नहीं खुलते हैं दफ़्तर रात में हम जुटा लेते हैं बिस्तर तो मगर रोज़ कम पड़ती है चादर रात में रोज़ ही वो एक लड़की सुब्ह सी जाती है हम को जगा कर रात में ख़्वाब देखा है इसी का रात भर सोए थे जिस को भुला कर रात में ज़िंदगी भर की कमाई एक रात जो मिली ख़ुद को गँवा कर रात में साँप दो आते हैं हम को काटने उस की यादें और ये घर रात में ज़िंदगी की रात इक दिन ख़त्म हो ये दुआ करते हैं अक्सर रात में

Vikram Sharma

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जिन से उठता नहीं कली का बोझ उन के कंधों पे ज़िंदगी का बोझ वक़्त जब हाथ में नहीं रहता किस लिए हाथ पर घड़ी का बोझ ब्याह के वक़्त की कोई फोटो गहनों के बोझ पर हँसी का बोझ सर पे यादों की टोकरी रख ली कम न होने दिया कमी का बोझ मिन्नतें क्यूँ करे ख़ुदा से अब आदमी बाँटे आदमी का बोझ ज़ब्त का बाँध टूट जाने दो कम करो आँख से नमी का बोझ हिज्र था एक ही घड़ी का पर दिल से उतरा न उस घड़ी का बोझ हम को ऐसे ख़ुदा क़ुबूल नहीं जिन से उठता नहीं ख़ुदी का बोझ

Vikram Sharma

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मैं तुझ सेे बात करने को तिरे किरदार में आ कर इधर से फ़ोन करता हूँ उधर से बात करता हूँ मैं तेरे साथ तो घर में बड़ा ख़ामोश रहता था नहीं मौजूद तू घर में तो घर से बात करता हूँ ख़िज़ाँ का कोई मंज़र मेरे अंदर रक़्स करता है कभी जो बन में गुल से या समर से बात करता हूँ

Vikram Sharma

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मिरी आदत है मैं हर राहबर से बात करता हूँ गुज़रता हूँ जो रस्ते से शजर से बात करता हूँ मैं तुझ से बात करने को तिरे किरदार में आ कर इधर से फ़ोन करता हूँ उधर से बात करता हूँ मैं तेरे साथ तो घर में बड़ा ख़ामोश रहता था नहीं मौजूद तू घर में तो घर से बात करता हूँ ख़िज़ाँ का कोई मंज़र मेरे अंदर रक़्स करता है कभी जो बन में गुल से या समर से बात करता हूँ सुख़न के फ़न को ऐसे ही तो ज़ाएअ'' कर नहीं सकता सो मैं ख़ुद से या फिर अहल-ए-नज़र से बात करता हूँ

Vikram Sharma

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सोचता हूँ कि दिल-ए-ज़ार का मतलब क्या है एक हँसते हुए बीमार का मतलब क्या है आप कहते हैं कि दीवार गिरा दी जाए आप की नज़रों में दीवार का मतलब क्या है आख़िरी फ़ैसला तुम अपने मुताबिक़ लोगे फिर मेरी हामी या इनकार का मतलब क्या है संग-दिल लोगों से क्या अपनी तबीअ'त कहते किसी दीवार से गुफ़्तार का मतलब क्या है उठ के जा सकते हैं हम ऐसों के साए से आप हम समझते हैं कि अश्जार का मतलब क्या है पहले पहले तो फ़क़त ज़ब्त के इम्कान रहे रफ़्ता रफ़्ता खुला इज़हार का मतलब क्या है मैं कि चुप ज़ात था सो शे'र कहा करता था पूछ लेती थी वो अश'आर का मतलब क्या है

Vikram Sharma

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