जिन से उठता नहीं कली का बोझ उन के कंधों पे ज़िंदगी का बोझ वक़्त जब हाथ में नहीं रहता किस लिए हाथ पर घड़ी का बोझ ब्याह के वक़्त की कोई फोटो गहनों के बोझ पर हँसी का बोझ सर पे यादों की टोकरी रख ली कम न होने दिया कमी का बोझ मिन्नतें क्यूँ करे ख़ुदा से अब आदमी बाँटे आदमी का बोझ ज़ब्त का बाँध टूट जाने दो कम करो आँख से नमी का बोझ हिज्र था एक ही घड़ी का पर दिल से उतरा न उस घड़ी का बोझ हम को ऐसे ख़ुदा क़ुबूल नहीं जिन से उठता नहीं ख़ुदी का बोझ
Related Ghazal
कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे
Vikram Gaur Vairagi
70 likes
मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
456 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
196 likes
तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
235 likes
More from Vikram Sharma
कौन निकले घर से बाहर रात में सो गए हम अपने अंदर रात में फिर से मिलने आ गईं तन्हाइयाँ क्यूँ नहीं खुलते हैं दफ़्तर रात में हम जुटा लेते हैं बिस्तर तो मगर रोज़ कम पड़ती है चादर रात में रोज़ ही वो एक लड़की सुब्ह सी जाती है हम को जगा कर रात में ख़्वाब देखा है इसी का रात भर सोए थे जिस को भुला कर रात में ज़िंदगी भर की कमाई एक रात जो मिली ख़ुद को गँवा कर रात में साँप दो आते हैं हम को काटने उस की यादें और ये घर रात में ज़िंदगी की रात इक दिन ख़त्म हो ये दुआ करते हैं अक्सर रात में
Vikram Sharma
2 likes
मैं तुझ सेे बात करने को तिरे किरदार में आ कर इधर से फ़ोन करता हूँ उधर से बात करता हूँ मैं तेरे साथ तो घर में बड़ा ख़ामोश रहता था नहीं मौजूद तू घर में तो घर से बात करता हूँ ख़िज़ाँ का कोई मंज़र मेरे अंदर रक़्स करता है कभी जो बन में गुल से या समर से बात करता हूँ
Vikram Sharma
1 likes
सोचता हूँ कि दिल-ए-ज़ार का मतलब क्या है एक हँसते हुए बीमार का मतलब क्या है आप कहते हैं कि दीवार गिरा दी जाए आप की नज़रों में दीवार का मतलब क्या है आख़िरी फ़ैसला तुम अपने मुताबिक़ लोगे फिर मेरी हामी या इनकार का मतलब क्या है संग-दिल लोगों से क्या अपनी तबीअ'त कहते किसी दीवार से गुफ़्तार का मतलब क्या है उठ के जा सकते हैं हम ऐसों के साए से आप हम समझते हैं कि अश्जार का मतलब क्या है पहले पहले तो फ़क़त ज़ब्त के इम्कान रहे रफ़्ता रफ़्ता खुला इज़हार का मतलब क्या है मैं कि चुप ज़ात था सो शे'र कहा करता था पूछ लेती थी वो अश'आर का मतलब क्या है
Vikram Sharma
5 likes
मिरी आदत है मैं हर राहबर से बात करता हूँ गुज़रता हूँ जो रस्ते से शजर से बात करता हूँ मैं तुझ से बात करने को तिरे किरदार में आ कर इधर से फ़ोन करता हूँ उधर से बात करता हूँ मैं तेरे साथ तो घर में बड़ा ख़ामोश रहता था नहीं मौजूद तू घर में तो घर से बात करता हूँ ख़िज़ाँ का कोई मंज़र मेरे अंदर रक़्स करता है कभी जो बन में गुल से या समर से बात करता हूँ सुख़न के फ़न को ऐसे ही तो ज़ाएअ'' कर नहीं सकता सो मैं ख़ुद से या फिर अहल-ए-नज़र से बात करता हूँ
Vikram Sharma
3 likes
ये कैसे सानहे अब पेश आने लग गए हैं तेरे आग़ोश में हम छट-पटाने लग गए हैं बहुत मुमकिन है कोई तीर हम को आ लगेगा हम ऐसे लोग जो पंछी उड़ाने लग गए हैं हमारे बिन भला तन्हाई घर में क्या ही करती उसे भी साथ ही ऑफ़िस में लाने लग गए हैं बदन पर याद की बारिश के छींटे पड़ गए थे पराई धूप में उन को सुखाने लग गए हैं हवा के एक ही झोंके में ये फल गिर पड़ेंगे ये बूढे पेड़ के कंधे झुकाने लग गए हैं नज़र के चौक पे बारिश झमाझम गिर रही है तो दिल के रूम में गाने पुराने लग गए हैं
Vikram Sharma
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Vikram Sharma.
Similar Moods
More moods that pair well with Vikram Sharma's ghazal.







