मिरी आदत है मैं हर राहबर से बात करता हूँ गुज़रता हूँ जो रस्ते से शजर से बात करता हूँ मैं तुझ से बात करने को तिरे किरदार में आ कर इधर से फ़ोन करता हूँ उधर से बात करता हूँ मैं तेरे साथ तो घर में बड़ा ख़ामोश रहता था नहीं मौजूद तू घर में तो घर से बात करता हूँ ख़िज़ाँ का कोई मंज़र मेरे अंदर रक़्स करता है कभी जो बन में गुल से या समर से बात करता हूँ सुख़न के फ़न को ऐसे ही तो ज़ाएअ'' कर नहीं सकता सो मैं ख़ुद से या फिर अहल-ए-नज़र से बात करता हूँ
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा
Tehzeeb Hafi
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मैं तुझ सेे बात करने को तिरे किरदार में आ कर इधर से फ़ोन करता हूँ उधर से बात करता हूँ मैं तेरे साथ तो घर में बड़ा ख़ामोश रहता था नहीं मौजूद तू घर में तो घर से बात करता हूँ ख़िज़ाँ का कोई मंज़र मेरे अंदर रक़्स करता है कभी जो बन में गुल से या समर से बात करता हूँ
Vikram Sharma
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कौन निकले घर से बाहर रात में सो गए हम अपने अंदर रात में फिर से मिलने आ गईं तन्हाइयाँ क्यूँ नहीं खुलते हैं दफ़्तर रात में हम जुटा लेते हैं बिस्तर तो मगर रोज़ कम पड़ती है चादर रात में रोज़ ही वो एक लड़की सुब्ह सी जाती है हम को जगा कर रात में ख़्वाब देखा है इसी का रात भर सोए थे जिस को भुला कर रात में ज़िंदगी भर की कमाई एक रात जो मिली ख़ुद को गँवा कर रात में साँप दो आते हैं हम को काटने उस की यादें और ये घर रात में ज़िंदगी की रात इक दिन ख़त्म हो ये दुआ करते हैं अक्सर रात में
Vikram Sharma
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जिन से उठता नहीं कली का बोझ उन के कंधों पे ज़िंदगी का बोझ वक़्त जब हाथ में नहीं रहता किस लिए हाथ पर घड़ी का बोझ ब्याह के वक़्त की कोई फोटो गहनों के बोझ पर हँसी का बोझ सर पे यादों की टोकरी रख ली कम न होने दिया कमी का बोझ मिन्नतें क्यूँ करे ख़ुदा से अब आदमी बाँटे आदमी का बोझ ज़ब्त का बाँध टूट जाने दो कम करो आँख से नमी का बोझ हिज्र था एक ही घड़ी का पर दिल से उतरा न उस घड़ी का बोझ हम को ऐसे ख़ुदा क़ुबूल नहीं जिन से उठता नहीं ख़ुदी का बोझ
Vikram Sharma
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सोचता हूँ कि दिल-ए-ज़ार का मतलब क्या है एक हँसते हुए बीमार का मतलब क्या है आप कहते हैं कि दीवार गिरा दी जाए आप की नज़रों में दीवार का मतलब क्या है आख़िरी फ़ैसला तुम अपने मुताबिक़ लोगे फिर मेरी हामी या इनकार का मतलब क्या है संग-दिल लोगों से क्या अपनी तबीअ'त कहते किसी दीवार से गुफ़्तार का मतलब क्या है उठ के जा सकते हैं हम ऐसों के साए से आप हम समझते हैं कि अश्जार का मतलब क्या है पहले पहले तो फ़क़त ज़ब्त के इम्कान रहे रफ़्ता रफ़्ता खुला इज़हार का मतलब क्या है मैं कि चुप ज़ात था सो शे'र कहा करता था पूछ लेती थी वो अश'आर का मतलब क्या है
Vikram Sharma
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वक़्त का दरिया तो हम पार नहीं कर सकते करना चाहे भी तो हम यार नहीं कर सकते! भूल जाना भी कोई काम हुआ करता है? काम ये आप के बीमार नहीं कर सकते! क्यूँँ सदा ढूँढ़ने होते है बहाने हम को क्यूँँ कभी खुल के हम इनकार नहीं कर सकते?
Vikram Sharma
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