कौन निकले घर से बाहर रात में सो गए हम अपने अंदर रात में फिर से मिलने आ गईं तन्हाइयाँ क्यूँ नहीं खुलते हैं दफ़्तर रात में हम जुटा लेते हैं बिस्तर तो मगर रोज़ कम पड़ती है चादर रात में रोज़ ही वो एक लड़की सुब्ह सी जाती है हम को जगा कर रात में ख़्वाब देखा है इसी का रात भर सोए थे जिस को भुला कर रात में ज़िंदगी भर की कमाई एक रात जो मिली ख़ुद को गँवा कर रात में साँप दो आते हैं हम को काटने उस की यादें और ये घर रात में ज़िंदगी की रात इक दिन ख़त्म हो ये दुआ करते हैं अक्सर रात में
Related Ghazal
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
465 likes
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
456 likes
क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
371 likes
More from Vikram Sharma
सोचता हूँ कि दिल-ए-ज़ार का मतलब क्या है एक हँसते हुए बीमार का मतलब क्या है आप कहते हैं कि दीवार गिरा दी जाए आप की नज़रों में दीवार का मतलब क्या है आख़िरी फ़ैसला तुम अपने मुताबिक़ लोगे फिर मेरी हामी या इनकार का मतलब क्या है संग-दिल लोगों से क्या अपनी तबीअ'त कहते किसी दीवार से गुफ़्तार का मतलब क्या है उठ के जा सकते हैं हम ऐसों के साए से आप हम समझते हैं कि अश्जार का मतलब क्या है पहले पहले तो फ़क़त ज़ब्त के इम्कान रहे रफ़्ता रफ़्ता खुला इज़हार का मतलब क्या है मैं कि चुप ज़ात था सो शे'र कहा करता था पूछ लेती थी वो अश'आर का मतलब क्या है
Vikram Sharma
5 likes
जिन से उठता नहीं कली का बोझ उन के कंधों पे ज़िंदगी का बोझ वक़्त जब हाथ में नहीं रहता किस लिए हाथ पर घड़ी का बोझ ब्याह के वक़्त की कोई फोटो गहनों के बोझ पर हँसी का बोझ सर पे यादों की टोकरी रख ली कम न होने दिया कमी का बोझ मिन्नतें क्यूँ करे ख़ुदा से अब आदमी बाँटे आदमी का बोझ ज़ब्त का बाँध टूट जाने दो कम करो आँख से नमी का बोझ हिज्र था एक ही घड़ी का पर दिल से उतरा न उस घड़ी का बोझ हम को ऐसे ख़ुदा क़ुबूल नहीं जिन से उठता नहीं ख़ुदी का बोझ
Vikram Sharma
0 likes
मैं तुझ सेे बात करने को तिरे किरदार में आ कर इधर से फ़ोन करता हूँ उधर से बात करता हूँ मैं तेरे साथ तो घर में बड़ा ख़ामोश रहता था नहीं मौजूद तू घर में तो घर से बात करता हूँ ख़िज़ाँ का कोई मंज़र मेरे अंदर रक़्स करता है कभी जो बन में गुल से या समर से बात करता हूँ
Vikram Sharma
1 likes
मिरी आदत है मैं हर राहबर से बात करता हूँ गुज़रता हूँ जो रस्ते से शजर से बात करता हूँ मैं तुझ से बात करने को तिरे किरदार में आ कर इधर से फ़ोन करता हूँ उधर से बात करता हूँ मैं तेरे साथ तो घर में बड़ा ख़ामोश रहता था नहीं मौजूद तू घर में तो घर से बात करता हूँ ख़िज़ाँ का कोई मंज़र मेरे अंदर रक़्स करता है कभी जो बन में गुल से या समर से बात करता हूँ सुख़न के फ़न को ऐसे ही तो ज़ाएअ'' कर नहीं सकता सो मैं ख़ुद से या फिर अहल-ए-नज़र से बात करता हूँ
Vikram Sharma
3 likes
अहले दुनिया नया नया हूँ मैं माज़रत, ख़्वाब देखता हूँ मैं उस की तस्वीर है घड़ी के पास हर घड़ी वक़्त देखता हूँ मैं इस क़दर तीरगी का क़ाइल हूँ धूप को धूप कह रहा हूँ मैं है परिंदों से ख़ामुशी दरकार पेड़ से बात कर रहा हूँ मैं
Vikram Sharma
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Vikram Sharma.
Similar Moods
More moods that pair well with Vikram Sharma's ghazal.







