ghazalKuch Alfaaz

अहले दुनिया नया नया हूँ मैं माज़रत, ख़्वाब देखता हूँ मैं उस की तस्वीर है घड़ी के पास हर घड़ी वक़्त देखता हूँ मैं इस क़दर तीरगी का क़ाइल हूँ धूप को धूप कह रहा हूँ मैं है परिंदों से ख़ामुशी दरकार पेड़ से बात कर रहा हूँ मैं

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो

Himanshi babra KATIB

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एक और शख़्स छोड़ कर चला गया तो क्या हुआ हमारे साथ कौन सा ये पहली मर्तबा हुआ अज़ल से इन हथेलियों में हिज्र की लकीर थी तुम्हारा दुख तो जैसे मेरे हाथ में बड़ा हुआ मेरे ख़िलाफ़ दुश्मनों की सफ़ में है वो और मैं बहुत बुरा लगूँगा उस पर तीर खींचता हुआ

Tehzeeb Hafi

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आईने आँख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था एक याद बसर करती थी मुझे मैं साँस नहीं ले पाता था एक शख़्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी रोता था तो रात उजड़ जाती हँसता था तो दिन बन जाता था मैं रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जा कर वो फोन उठाता था मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था हम एक ज़िंदान में ज़िंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था वो जिस्म नज़र-अंदाज़ नहीं हो पाता था इन आँखों से मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था

Tehzeeb Hafi

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कौन निकले घर से बाहर रात में सो गए हम अपने अंदर रात में फिर से मिलने आ गईं तन्हाइयाँ क्यूँ नहीं खुलते हैं दफ़्तर रात में हम जुटा लेते हैं बिस्तर तो मगर रोज़ कम पड़ती है चादर रात में रोज़ ही वो एक लड़की सुब्ह सी जाती है हम को जगा कर रात में ख़्वाब देखा है इसी का रात भर सोए थे जिस को भुला कर रात में ज़िंदगी भर की कमाई एक रात जो मिली ख़ुद को गँवा कर रात में साँप दो आते हैं हम को काटने उस की यादें और ये घर रात में ज़िंदगी की रात इक दिन ख़त्म हो ये दुआ करते हैं अक्सर रात में

Vikram Sharma

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जिन से उठता नहीं कली का बोझ उन के कंधों पे ज़िंदगी का बोझ वक़्त जब हाथ में नहीं रहता किस लिए हाथ पर घड़ी का बोझ ब्याह के वक़्त की कोई फोटो गहनों के बोझ पर हँसी का बोझ सर पे यादों की टोकरी रख ली कम न होने दिया कमी का बोझ मिन्नतें क्यूँ करे ख़ुदा से अब आदमी बाँटे आदमी का बोझ ज़ब्त का बाँध टूट जाने दो कम करो आँख से नमी का बोझ हिज्र था एक ही घड़ी का पर दिल से उतरा न उस घड़ी का बोझ हम को ऐसे ख़ुदा क़ुबूल नहीं जिन से उठता नहीं ख़ुदी का बोझ

Vikram Sharma

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सोचता हूँ कि दिल-ए-ज़ार का मतलब क्या है एक हँसते हुए बीमार का मतलब क्या है आप कहते हैं कि दीवार गिरा दी जाए आप की नज़रों में दीवार का मतलब क्या है आख़िरी फ़ैसला तुम अपने मुताबिक़ लोगे फिर मेरी हामी या इनकार का मतलब क्या है संग-दिल लोगों से क्या अपनी तबीअ'त कहते किसी दीवार से गुफ़्तार का मतलब क्या है उठ के जा सकते हैं हम ऐसों के साए से आप हम समझते हैं कि अश्जार का मतलब क्या है पहले पहले तो फ़क़त ज़ब्त के इम्कान रहे रफ़्ता रफ़्ता खुला इज़हार का मतलब क्या है मैं कि चुप ज़ात था सो शे'र कहा करता था पूछ लेती थी वो अश'आर का मतलब क्या है

Vikram Sharma

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मैं तुझ सेे बात करने को तिरे किरदार में आ कर इधर से फ़ोन करता हूँ उधर से बात करता हूँ मैं तेरे साथ तो घर में बड़ा ख़ामोश रहता था नहीं मौजूद तू घर में तो घर से बात करता हूँ ख़िज़ाँ का कोई मंज़र मेरे अंदर रक़्स करता है कभी जो बन में गुल से या समर से बात करता हूँ

Vikram Sharma

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ये कैसे सानहे अब पेश आने लग गए हैं तेरे आग़ोश में हम छट-पटाने लग गए हैं बहुत मुमकिन है कोई तीर हम को आ लगेगा हम ऐसे लोग जो पंछी उड़ाने लग गए हैं हमारे बिन भला तन्हाई घर में क्या ही करती उसे भी साथ ही ऑफ़िस में लाने लग गए हैं बदन पर याद की बारिश के छींटे पड़ गए थे पराई धूप में उन को सुखाने लग गए हैं हवा के एक ही झोंके में ये फल गिर पड़ेंगे ये बूढे पेड़ के कंधे झुकाने लग गए हैं नज़र के चौक पे बारिश झमाझम गिर रही है तो दिल के रूम में गाने पुराने लग गए हैं

Vikram Sharma

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