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ये ज़बाँ हम सेे सी नहीं जाती ज़िन्दगी है कि जी नहीं जाती इन सफ़ीलों में वो दरारे हैं जिन में बस कर नमी नहीं जाती देखिए उस तरफ़ उजाला है जिस तरफ़ रौशनी नहीं जाती शाम कुछ पेड़ गिर गए वरना बाम तक चांदनी नहीं जाती एक आदत-सी बन गई है तू और आदत कभी नहीं जाती मयकशो मय ज़रूर है लेकिन इतनी कड़वी कि पी नहीं जाती मुझ को ईसा बना दिया तुम ने अब शिकायत भी की नहीं जाती

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ये शफ़क़ शाम हो रही है अब और हर गाम हो रही है अब जिस तबाही से लोग बचते थे वो सर-ए-आम हो रही है अब अज़मत-ए-मुल्क इस सियासत के हाथ नीलाम हो रही है अब शब ग़नीमत थी लोग कहते हैं सुब्ह बदनाम हो रही है अब जो किरन थी किसी दरीचे की मरक़ज-ए-बाम हो रही है अब तिश्ना-लब तेरी फुसफुसाहट भी एक पैग़ाम हो रही है अब

Dushyant Kumar

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लफ़्ज़ एहसास-से छाने लगे, ये तो हद है लफ़्ज़ माने भी छुपाने लगे, ये तो हद है आप दीवार उठाने के लिए आए थे आप दीवार उठाने लगे, ये तो हद है ख़ामुशी शोर से सुनते थे कि घबराती है ख़ामुशी शोर मचाने लगे, ये तो हद है आदमी होंठ चबाए तो समझ आता है आदमी छाल चबाने लगे, ये तो हद है जिस्म पहरावों में छुप जाते थे, पहरावों में जिस्म नंगे नज़र आने लगे, ये तो हद है लोग तहज़ीब-ओ-तमद्दुन के सलीक़े सीखे लोग रोते हुए गाने लगे, ये तो हद है

Dushyant Kumar

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अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाए तिरी सहर हो मिरा आफ़्ताब हो जाए हुज़ूर आरिज़-ओ-रुख़्सार क्या तमाम बदन मिरी सुनो तो मुजस्सम गुलाब हो जाए उठा के फेंक दो खिड़की से साग़र-ओ-मीना ये तिश्नगी जो तुम्हें दस्तियाब हो जाए वो बात कितनी भली है जो आप करते हैं सुनो तो सीने की धड़कन रबाब हो जाए बहुत क़रीब न आओ यक़ीं नहीं होगा ये आरज़ू भी अगर कामयाब हो जाए ग़लत कहूँ तो मिरी आक़िबत बिगड़ती है जो सच कहूँ तो ख़ुदी बे-नक़ाब हो जाए

Dushyant Kumar

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जाने किस किस का ख़याल आया है इस समुंदर में उबाल आया है एक बच्चा था हवा का झोंका साफ़ पानी को खँगाल आया है एक ढेला तो वहीं अटका था एक तू और उछाल आया है कल तो निकला था बहुत सज-धज के आज लौटा तो निढाल आया है ये नज़र है कि कोई मौसम है ये सबा है कि वबाल आया है हम ने सोचा था जवाब आएगा एक बेहूदा सवाल आया है

Dushyant Kumar

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वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है वो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है सामान कुछ नहीं है फटे-हाल है मगर झोले में उस के पास कोई संविधान है उस सर-फिरे को यूँँ नहीं बहला सकेंगे आप वो आदमी नया है मगर सावधान है फिस्ले जो उस जगह तो लुढ़कते चले गए हम को पता नहीं था कि इतनी ढलान है देखे हैं हम ने दौर कई अब ख़बर नहीं पावँ तले ज़मीन है या आसमान है वो आदमी मिला था मुझे उस की बात से ऐसा लगा कि वो भी बहुत बे-ज़बान है

Dushyant Kumar

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