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zahr piye madhosh andheri raat nagin si khamosh andheri raat din ki surat mujh ko bhi kha ja aa kar main bhi huun behosh andheri raat shahron men khamoshi hi khamoshi thi tufan tha pur-josh andheri raat kya jaane kis ne odha mera paikar main khvab-e-khargosh andheri raat chandi jaisi kirnen mujh par mat daalo mera to sar-posh andheri raat niind kahan mere ghar aaegi 'badnam' main khana-bar-dosh andheri raat zahr piye madhosh andheri raat nagin si khamosh andheri raat din ki surat mujh ko bhi kha ja aa kar main bhi hun behosh andheri raat shahron mein khamoshi hi khamoshi thi tufan tha pur-josh andheri raat kya jaane kis ne odha mera paikar main khwab-e-khargosh andheri raat chandi jaisi kirnen mujh par mat dalo mera to sar-posh andheri raat nind kahan mere ghar aaegi 'badnam' main khana-bar-dosh andheri raat

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एक ही मुज़्दा सुब्ह लाती है धूप आँगन में फैल जाती है रंग-ए-मौसम है और बाद-ए-सबा शहर कूचों में ख़ाक उड़ाती है फ़र्श पर काग़ज़ उड़ते फिरते हैं मेज़ पर गर्द जमती जाती है सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर अब किसे रात भर जगाती है मैं भी इज़्न-ए-नवा-गरी चाहूँ बे-दिली भी तो लब हिलाती है सो गए पेड़ जाग उठी ख़ुश्बू ज़िंदगी ख़्वाब क्यूँँ दिखाती है उस सरापा वफ़ा की फ़ुर्क़त में ख़्वाहिश-ए-ग़ैर क्यूँँ सताती है आप अपने से हम-सुख़न रहना हम-नशीं साँस फूल जाती है क्या सितम है कि अब तिरी सूरत ग़ौर करने पे याद आती है कौन इस घर की देख-भाल करे रोज़ इक चीज़ टूट जाती है

Jaun Elia

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क्या ग़लतफ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं वो मुझे समझा तो सकता था कि ऐसा कुछ नहीं इश्क़ से बच कर भी बंदा कुछ नहीं होता मगर ये भी सच है इश्क़ में बंदे का बचता कुछ नहीं जाने कैसे राज़ सीने में लिए बैठा है वो ज़ह्र खा लेता है पर मुँह से उगलता कुछ नहीं शुक्र है कि उस ने मुझ सेे कह दिया कि कुछ तो है मैं उस सेे कहने ही वाला था कि अच्छा कुछ नहीं

Tehzeeb Hafi

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वो जिस के पाँव में रक्खे हों काइनात के फूल क़ुबूल कैसे करेगा वो मेरे हाथ के फूल बनी भी उस की किसी से तो सिर्फ़ हम से ही उसे पसंद भी आए तो काग़ज़ात के फूल किसी का तोहफ़ा किसी और को दिया उस ने किसी को दे दिए उस ने किसी के हाथ के फूल लिए गए थे किसी सेज पर बिछाने को जनाज़ा खा गया सारे सुहागरात के फूल वो ख़ुश्बुओं का भी मज़हब निकाल लेता है उसे ये लगता है होते हैं ज़ात पात के फूल उदास लोगों को देते नहीं हैं फूल उदास सहर में देना न उस को कभी भी रात के फूल किसी ज़माने में महँगा नहीं था इश्क़ मियाँ कि चाय ढाई की आती थी साढे सात के फूल

Varun Anand

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फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी

Kumar Vishwas

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आईने आँख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था एक याद बसर करती थी मुझे मैं साँस नहीं ले पाता था एक शख़्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी रोता था तो रात उजड़ जाती हँसता था तो दिन बन जाता था मैं रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जा कर वो फोन उठाता था मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था हम एक ज़िंदान में ज़िंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था वो जिस्म नज़र-अंदाज़ नहीं हो पाता था इन आँखों से मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था

Tehzeeb Hafi

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